Watch “PM Modi attends the unveiling ceremony of portrait of Shri Atal Bihari Vajpayee in the Parliament” on YouTube

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मोदी की अरुणाचल यात्रा पर चीन ने जताया विरोध

चीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अरुणाचल प्रदेश के दौरे का विरोध किया है. शनिवार को उसने कहा कि वह कभी इस संवेदनशील सीमांत प्रदेश को मान्यता नहीं देगा. नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अरुणाचल प्रदेश में चार हजार करोड़ रुपये की अलग-अलग परियोजनाओं का उद्घाटन किया.

पीटीआई के मुताबिक चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने नरेंद्र मोदी के अरुणाचल प्रदेश दौरे पर एक सवाल के जवाब में कहा, ‘चीन-भारत सीमा सवाल पर चीन का रुख सुसंगत और सुस्पष्ट है. चीन सरकार ने कभी तथाकथित ‘अरुणाचल प्रदेश’ को मान्यता नहीं दी है.’ उनका आगे कहना था कि भारतीय नेतृत्व को ऐसी किसी कार्रवाई से परहेज करना चाहिए जो सीमा मुद्दे को जटिल बनाए.

उधर, भारत ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है. नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, ‘भारतीय नेता समय समय पर अरुणाचल प्रदेश का दौरा करते हैं जैसे वे भारत के अन्य भागों का दौरा करते हैं. इस सुसंगत रुख से अनेक मौकों पर चीनी पक्ष को अवगत कराया जा चुका है.’ चीन दावा करता है कि अरुणाचल प्रदेश दक्षिण तिब्बत का हिस्सा है. भारत और चीन सीमा विवाद निबटाने के लिए अब तक 21 दौर की बातचीत कर चुके हैं.

मोदी जी के वो वादे जो वादे ही रह गए

1 मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ की बातें करते हैं, लेकिन आम आदमी के लिए इसके क्या मायने होंगे, उसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है.

2 भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जंग

भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में जनता को ‘भ्रष्टाचार मुक्त सरकार’ देने का वादा किया था.

हालांकि सत्ता में आने के सौ दिन बाद भी भ्रष्टाचार कम करने को लेकर कोई बड़े नीतिगत सुधार या क़ानून नहीं देखने को मिले हैं.

3 काले धन की वापसी

बीजेपी नेता राजनाथ सिंह ने इस साल अप्रैल में दावा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो विदेशों में जमा काला धन 150 दिनों के भीतर भारत लाया जाएगा और वेलफेयर योजनाओं में लगाया जाएगा.

लेकिन अब बीजेपी के ही एक सांसद निशिकांत दुबे ने कह दिया है कि सरकार विदेशों में जमा काला धन नहीं ला पाएगी.

काले धन पर विशेष जांच दल ज़रूर बनाई गई और दल ने अपनी पहली रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में जमा कर दी है, लेकिन काले धन की वापसी कैसे होगी, इसपर कोई समयबद्ध योजना भी सामने नहीं आई है.

4. महंगाई से मुक़ाबला

महंगाई के मुद्दे पर यूपीए सरकार को लगातार घेरने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पहले सौ दिन में महंगाई में कोई बड़ी कमी देखने को नहीं मिली है.

देश के कई हिस्सों में औसत से कम बारिश के बावजूद खाद्य मुद्रास्फ़िति दर में हल्का सुधार सरकार के पक्ष में है, लेकिन सब्ज़ियां और खाने-पीने की चीज़ें अभी भी महंगी बनी हुई है.

5. इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में जान फूंकने का वादा

नरेंद्र मोदी सरकार निर्माण क्षेत्र में सुधार के लिए ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप’ योजनाओं में सुधार चाहती है. लेकिन ये कैसे होगा उसे लेकर रोडमैप स्पष्ट नहीं दिखता.

इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की सरकार की कोशिशों को रिज़र्व बैक के उस नियम से भी नुकसान पहुंचा है, जिसके तहत बैंक इंफ्रास्ट्क्चर बैकों में निवेश नहीं कर सकते.

6. घुसपैठ रोकने की कोशिश

नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले अपने भाषणों में भारत में अवैध तौर पर रह रहे बांग्लादेशियों के खिलाफ़ जमकर मोर्चा खोला था और घुसपैठ रोकने का वादा भी किया था.

लेकिन सौ दिन बीत जाने के बाद भी बांग्लादेश के साथ मिलकर इस समस्या का हल निकालने की सार्थक कोशिश नहीं की गई है.

7. भूमि अधिग्रहण क़ानून

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी प्रचार में भूमि अधिग्रहण कानून में ‘सुधार’ की मांग पर ज़ोर दिया था. जानकारों का मानना है यूपीए-2 में बना नया क़ानून निर्माण क्षेत्र के विकास में बाधा पहुंचा सकता है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली इस बारे में बात करते रहे हैं, लेकिन क़ानून में बदलाव को लेकर सरकार ने कोई साफ़ संकेत नहीं दिए हैं.

8. राष्ट्रीय शिक्षा नीति

भारत में शिक्षा की गुणवत्ता, रिसर्च और इनोवेशन की चुनौतियों को दूर करने के लिए नई सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने का वायदा किया था. लेकिन सौ दिनों में इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

9. राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज प्रणाली

खेल को लेकर नई सरकार काफ़ी संजीदा दिखी थी और पूरे देश से खेल प्रतिभाओं को ढूंढने के लिए एक प्रणाली बनाने की घोषणा की थी. लेकिन ये भी अब तक कागज़ों में ही दिखती है.

10. जन वितरण प्रणाली में सुधार

जन वितरण प्रणाली में सुधार पर चुनावी प्रचार में बीजेपी का खासा ज़ोर था. सुधार के लिए पूरे देश में गुजरात मॉडल को लागू किए जाने की चर्चा थी.

सातवां वेतन आयोग ने केन्द्रीय कर्मचारियों का वेतन में संशोधन किया

सातवां वेतन आयोग: हालांकि केंद्र सरकार के कर्मचारी एक नए fitment फैक्टर का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन भारतीय रेलवे के हजारों कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर आ चुकी है । रेलवे ने अपने गार्डों, लोको पायलटों और सहायक लोको पायलटों के चल रहे भत्ते को दोगुने से अधिक करने का निर्णय लिया है, जिससे कर्मचारी संघों की लंबे समय से लंबित मांग को स्वीकार किया जा रहा है । एक स्रोत ने गुरुवार को कहा, इस कदम से १,२२५ करोड़ रुपये के भत्तों का वार्षिक वित्तीय बोझ बढ़ेगा और परिचालन अनुपात में २.५ प्रतिशत की वृद्धि होगी ।

नवंबर २०१८ में, राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर के पास ११७.०५ प्रतिशत का रिकॉर्ड-उच्च परिचालन अनुपात था, जिसका मतलब है कि यह ११७.०५ रुपए खर्च कर प्रत्येक १०० रु.–जो इसके वित्तीय स्वास्थ्य का सूचक है ।

वर्तमान में, लोको ड्राइवर्स, सहायक लोको ड्राइवर्स और गार्ड, जो एक रेलगाड़ी के मूवमेंट में मदद करते है और ‘ रनिंग स्टाफ ‘ कहलाते हैं, को २५५ रुपए प्रति १०० किमी का चल भत्ता भुगतान मिलता है, जिसे अब लगभग ५२० रुपए संशोधित किया जा रहा है ।

इससे भत्तों के वार्षिक वित्तीय बोझ में वृद्धि होगी…

आरटीआई से खुलासा, 2004 से 2017 के बीच सांप्रदायिक हिंसा में 1600 से अधिक लोगों की मौत

BY   द वायर स्टाफ   ON   03/01/2019 

गृह मंत्रालय ने बताया कि भारत में साल 2004 से 2017 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 10,399 घटनाएं हुईं. इसमें 1,605 लोग मारे गए और 30,723 लोग घायल हुए

नई दिल्ली: भारत में साल 2004 से 2017 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 10,399 घटनाएं हुईं. इसमें 1,605 लोग मारे गए और 30,723 लोग घायल हुए. गृह मंत्रालय ने एक आरटीआई के जवाब में यह जानकारी दी है.

सूचना का अधिकार आवेदन के तहत खुलासा हुआ है कि सांप्रदायिक हिंसा की सबसे अधिक 943 घटनाएं 2008 में हुईं. साल 2008 में हिंसा में 167 लोग मारे गए और 2,354 लोग घायल हुए.

गृह मंत्रालय ने नोएडा के आईटी प्रोफेशनल और आरटीआई कार्यकर्ता अमित गुप्ता की अर्जी के जवाब में कहा कि हिंसा के सबसे कम 580 मामले 2011 में दर्ज किए गए. इस दौरान 91 लोगों की मौत हुई और 1,899 लोग घायल हुए.

गुप्ता ने यह भी पूछा कि इस दौरान सांप्रदायिक झड़पों, दंगों और लड़ाइयों के संबंध में कितने लोग गिरफ्तार और दोषी सिद्ध हुए. इस पर मंत्रालय ने बताया कि ऐसे आंकड़े राज्य सरकार के पास होते हैं क्योंकि पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य का विषय है.

गुप्ता से यह पूछे जाने पर कि उन्होंने 2004 से सांप्रदायिक झड़पों के आंकड़े क्यों मांगे, इस पर उन्होंने बताया, ‘मैं सांप्रदायिक झड़पों, लड़ाइयों या दंगों की घटनाओं पर तथ्यों को सामने लाना चाहता था. इसलिए मैंने 2004 से 2017 तक के राज्यवार ब्यौरे मांगे ताकि यूपीए और एनडीए सरकारों के दौरान चीजें साफ हो सके.’

आरटीआई से मिले जवाब के अनुसार 2017 में सांप्रदायिक हिंसा के 822 मामले दर्ज किए गए, जिसमें 111 लोग मारे गए और 2,384 घायल हुए. जबकि 2016 में, 703 मामले दर्ज किए गए थे, 86 लोग मारे गए थे और 2,321 घायल हुए थे.

इसी तरह 2015 में 751 मामले सामने आए, 97 लोग मारे गए और 2,264 घायल हुए. जबकि 2014 में सांप्रदायिक झड़पों के 644 मामले सामने आए, 95 लोग मारे गए और 1,921 लोग घायल हुए.

गृह मंत्रालय ने बताया कि 2013 में इस तरह के 823 मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें 133 लोग मारे गए थे और 2,269 लोग घायल हुए थे, जबकि 2012 में सांप्रदायिक झड़पों के 668 मामले थे, 94 लोग मारे गए थे और 2,117 घायल हुए थे.

साल 2009 में सांप्रदायिक झड़पों के दूसरे अधिकतम 849 मामले आए, जिसमें 125 लोगों की जान चली गई और एक वर्ष में 2,461 लोग घायल हुए थे.

इससे पहले पिछले साल केंद्र सरकार ने बताया कि साल 2017 में देश में सांप्रदायिक हिंसा की 822 घटनाएं हुईं जिनमें 111 लोगों की मौत हो गई. गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने राज्यसभा को बताया कि साल 2016 में सांप्रदायिक हिंसा की 703 घटनाएं हुईं जिनमें 86 लोगों की जान गई.

वहीं 2015 में सांप्रदायिक हिंसा की 751 घटनाओं में 97 लोग मारे गए थे. हालांकि 2015 से पहले तक के आंकड़ों को देखें तो 2014 से लेकर 2017तक में सांप्रदायिक हिंसा की 2,920 घटनाएं हुईं हैं जिसमें 389 लोगों की मौत हो गई. वहीं इन घटनाओं में 8,890 लोग घायल हुए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

मोदी जी ने कहा वो अपना साम्राज्य बनाना चाहते हैं

नई दिल्ली : अपनी पार्टी के खिलाफ महागठबंधन बनाने के अपने प्रयासों के लिए विपक्षी दलों पर कटाक्ष करते हुए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि भाजपा यहां देश की सेवा करने के लिए है, जबकि दूसरी तरफ “अवसरवादी गठबंधन, वंशवादी पार्टियां” हैं।

भाजपा के खिलाफ गठबंधन एक ‘अल्पकालिक’ है, जो संबंधित पक्षों के लाभ के लिए किया जा रहा है। “वे अपने स्वयं के साम्राज्य का निर्माण करना चाहते हैं, लेकिन हम लोगों को सशक्त बनाना चाहते हैं,” उन्होंने कहा।“अन्य दलों के विपरीत, हम वोट-बैंक के निर्माण और शासन के लिए राजनीति में नहीं हैं। हम यहां हर तरह से देश की सेवा करने के लिए हैं, ”उन्होंने तमिलनाडु में पांच संसदीय क्षेत्रों के बूथ स्तर के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत के दौरान कहा।

“आगामी चुनाव भाजपा और देश के लिए हमारे विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक तरफ हमारा विकास का एजेंडा है और दूसरी तरफ अवसरवादी गठबंधन और वंशवादी पार्टियां हैं। ” उन्होंने कहा, किसी का नाम लिए बगैर। विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए, पीएम ने पूछा: “अगर मोदी खराब हैं और सरकार काम नहीं कर रही है, तो गठबंधन की क्या जरूरत है? क्या आपको अपने बारे में आश्वस्त नहीं होना चाहिए? वे जानते हैं कि यह काम करने वाली सरकार है। ”

उन्होंने कहा कि युवाओं, किसानों और महिलाओं सहित समाज के कई वर्गों का भाजपा सरकार के साथ एक मजबूत रिश्ता है। श्री मोदी की टिप्पणी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी द्वारा भगवा पार्टी का मुकाबला करने के लिए उत्तर प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन की घोषणा करने के एक दिन बाद आई।

एसबीआई ऑनलाइन अकाउंट कैसे खोले युनो ऐप कैसे यूज करें

हैलो दोस्तों।    Hindi viral news में आपका स्वागत है आज हम आपको बताएँगे की Yono App Kya Hai  आज की पोस्ट Yono SBI App Kaise Use Kare अच्छी लगेगी क्योंकि इस पोस्ट में हम आपको सरल भाषा में इसके बारे में बताएँगे अगर आप इसके बारे में जानना चाहते है तो हम आपको इसके बारे में पूरी जानकारी देंगे बस इसके लिए हमारी पोस्ट को शुरू से अंत तक ज़रुर पढ़े।

Yono एक Android Application है जिसे SBI द्वारा Launch किया गया है इसकी Help से आप सभी ऑनलाइन Work कर सकते है इसके द्वारा आप SBI का पूरा Transaction कर सकते है, किसी होटल को Book करना चाहते है तो कर सकते है इसके अलावा आप ट्रेन और बस की Ticket भी Book कर सकते है।

Yono App से आप अपने SBI Account को भी Handle कर सकते है इस Application में बैंक Account Opening से लेकर कई सारे ऑनलाइन Work कर सकते है इस Application में Banking और Lifestyle से जुड़ी दोनों चीजें है अगर आप इसके बारे में और अधिक जानकारी पाना चाहते है तो चलिए हम आपको इसके बारे में पूरी जानकारी देंगे।

युनो एसबीआई ऐप क्या है 

यह देश के सबसे बड़े सहकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी किया ऐप है। इसका पूरा नाम You Only Need One है। इस App में आप SBI पर अपना Digital Account Open कर सकते है|

इस एप्लिकेशन में यूजर फाइनेंशियल और दूसरी सर्विस जैसे- Taxi Booking, Online Shopping, Medical Bill Payment आदि कार्य कर सकते है।

Yono App को भारत के वित्तीय मंत्री अरुण जेटली द्वारा 24 नवंबर 2017 को Launch किया गया था इस App में Amazon, Mantra, Uber, Yatra.Com, Jabbong और बायजुस जैसी 60 E-commerce Company है इस एप्लिकेशन में 60 सर्विस का एक जगह Use कर सकते है।

Yono SBI App कैसे डाउनलोड करे 

Yono SBI App को आप Google के Play Store में जाकर Download कर सकते है 

सबसे पहले अपने फ़ोन के Playstore को Open करे अब आपको सबसे उपर Search Menu दिखाई देगा वहां पर Yono SBI टाइप करे और Serch पर क्लिक करे।

जैसे ही आप Search पर क्लिक करेंगे तब आपके सामने Yono SBI App Open हो जायेगा वहां पर Install Button पर क्लिक करके आप Yono App Download कर सकते है।

यूनो एसबीआई मै रजिस्टर कैसे करे 

अगर आपके पास Netbanking की सुविधा नही है तो कोई बात नही आप अपने Debit कार्ड का उपयोग करके ऑनलाइन Netbanking Active कर सकते है तो चलिए जानते है कैसे आप यूनो एसबीआई ऐप मै रजिस्टर कर  सकते है।

Existing Customer

एसबीआई यूनो ऐप को download  करने के बाद इसे अपने फ़ोन में ओपन  करे यहाँ पर आपको Existing Customer (One Time Register) का Option दिखाई देगा उस पर क्लिक करे।

I Have Internet Banking ID

Next Page पर आपको दो Option दिखाई देंगे अगर आपकी इंटरनेट Banking पर ID नही है तो I Don’t Have Internet Banking ID पर क्लिक और अगर आपकी इंटरनेट Banking पर ID है तो I Have Internet Banking ID पर क्लिक करे।

यहाँ पर आप I Have Internet Banking ID पर क्लिक करे यहाँ पर आपको अपने Atm कार्ड की Details को Fill करना है सबसे पहले अपना Atm कार्ड नंबर Enter करे और फिर आपके Atm का Pin डाले और Submit Button पर क्लिक कर दे।

Username And Password

इस Page पर आपका SBI Username और Password Enter करे और Submit Button पर क्लिक कर दे।

Terms And Conditions

यदि आप Password के बजाय Mpin Login करने के लिए उपयोग करना चाहते है तो Mpin के Terms And Conditions को अच्छे से पढ़ ले और इसके Check Box पर क्लिक कर दे।

Set MPIN

अब आपको 6 Digit के Mpin Set करना है आप Login करने के लिए इस Mpin का Use कर सकते है।

Enter OTP

अब आपके Registered मोबाइल नंबर पर आये हुए OTP को Enter करे और Next पर क्लिक कर दे।

Enter MPIN

अब आप Yono पर Registered है और इसके उपयोग करने के लिए तैयार है Login स्क्रीन खोले और इसमे Login होने के लिए अपना Mpin Enter करे आप Login करने के लिए Netbanking User ID और Password का भी Use कर सकते है।

तो इस प्रकार आप SBI Yono Digital Banking के आवेदन को Register और Active कर सकते है यह Balance Check करने और Fund Transfer करने के लिए उपयोगी है।

यूनो ऐप से पैसा ट्रान्सफर कैसे करे 

Log In

सबसे पहले Yono SBI App को Open करे और उसे Login With MPIN या Login With User देकर Login करे।

Fund Transfer

Login करने के बाद आप एसबीआई यूनो ऐप के Dashboard में आ जायेंगे यहाँ पर आपको बहुत सारे Option मिलेंगे यह पर हमें Fund Transfer करना है उस पर क्लिक करे।

Pay A Beneficiary

अब आपको सबसे नीचे एक Pay A Beneficiary का Option मिलेगा उस पर क्लिक करे यहाँ पर आपको अपना Internet Banking Profile Password Enter करना है और फिर Confirm पर क्लिक कर दे।

Account Numbe

अब आपको तीन Option मिलेंगे जिसके Through आप पैसे भेजना चाहते है उसे Select करे जिससे आप पैसे भेजना चाहते है Account नंबर सबसे Common है तो उसे Select करके और Next पर क्लिक करे।Enter Detail

अब जिसे पैसे भेजना चाहते है उसकी Detail Enter करे उसके बाद आपका जो नंबर बैंक में Registered है उस पर एक OTP आयेगा उसे टाइप करके Next पर क्लिक करे उसके बाद आपको Your Transaction Is Successful का Message आयेगा मतलब आपके पैसे Transfer हो गये है।

अगर आपके पास एसबीआई अकाउंट है और नेट बैंकिंग नहीं है तो आप कैसे यूनो ऐप मै कैसे लॉगिंग करेंगे नीचे पढ़े 

सबसे पहले यूनो एसबीआई ऐप ओपन करे उसके बाद एक्साइटिंग कस्टमर पर क्लिक करें

उसके बाद आपको दो ऑप्शन दिखाई देगा 

पहला  I Don’t Have Internet Banking ID पर क्लिक करे उसके बाद दो ऑप्शन दिखाई देगा पहले वाले मै एटीएम कार्ड नंबर और दूसरे वाले मै एमटीएम पिन उसके बाद सुमित पर क्लिक करे 

Open A New Digital Account

सबसे पहले यूनो एसबीआई एप्लिकेशन को ओपन  करे यहाँ पर आपको तीन ऑप्शन  देखेंगे आपको यहाँ पर Open A New Digital Account पर क्लिक करना है।

जैसे ही आप इस पर क्लिक करेंगे तब आपको यहाँ पर दो ऑप्शन  मिलेंगे एक Degital Saving Account और दूसरा Insta Saving Account है इन दोनों Account में आपको कोई भी फॉर्म भरकर बैंक में जमा करने की जरूरत नही होती है|

Insta saving Account को तुरंत ही Activate कर दिया जाता है

 Digital Account के लिए आपको एक बार ब्रांच में जाना  होगा बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन करवाने के लिए और इसके बाद आपके अकाउंट को तुरंत की एक्टिवेट कर दिया जायेगा।

Digital Saving Account में आपको 5 लाख का Insurance मिलता है और एक Platinum कार्ड भी दिया जाता है जिससे आप Atm से हर रोज 1 लाख रूपये तक निकल सकते है।

इसमे पैसे डिपॉज़िट करने के लिए और ट्रांजेकशन करने के लिए कोई भी Limit 

अगर आप ऑनलाइन saving account खोलना चाहते है तो चलिए शुरू करते है कैसे आप ऑनलाइन अकाउंट खोल सकते है

यहाँ पर आपको दो Option मिलेंगे Apply Now और Resume अगर किसी फॉर्म को भरते समय आपका Session Expire हो जाता है तो आप Resume के Option को Select करके उसमे अपना Mobile नंबर और Password डालकर उसी Page पर दोबारा जा सकते है तो अब Apply Now पर Click करे। यहाँ पर आपको कुछ Information मिलेंगी उन्हें अच्छे से पढ़ ले और Next पर क्लिक कर दे।

Mobile Number And Email ID

इस Page पर आपको अपना Email ID और Mobile Number Enter करना है और Referal Code को Blank छोड़ देना है इसके बाद Submit पर क्लिक कर देना है।

Enter OTP

अब आपके नंबर पर एक OTP आयेगा जिसे आपको यहाँ पर Enter करना है और उसके बाद Submit Button पर क्लिक करना है।

Password

इस Page पर आपको कम से कम 8 Character का Password बनना होगा और Password को आपको Upercase, Lowercase, Digit और Special Charater में बनाये और Re-enter Password करे उसके बाद Security Question को Select करे और Next पर क्लिक करे।

FATCA/CRS Declaration

FATCA/CRS Declaration में Yes Select करे।

Personal Detail

जैसे ही आप Yes पर क्लिक करेंगे तब आपके सामने एक Page Open होगा वहां पर आपको अपनी Personal Detail को Fill करना है आप दिए गये Option को पढ़कर Details Fill कर सकते है।

Additional Detail

अब आपको अपनी Additional Detail को Fill करना है।

Nominee Detail

यह पर आपको दो Option मिलेंगे आप यहाँ पर Enter Nominee Detail पर क्लिक करे और उसमे पूछे गये सारे Option को Fill करे।

Select Your Home Branch

इसमे आपको दो Option दिखाई देंगे यहाँ पर आपको By Locality Select करना है और Next पर क्लिक करना है और दिए गये Option को Fill करे।

Just A Step More

यहाँ पर आपको एक Reference Code दिया जायेगा जो 15 दिन के लिए Valid होगा आपको अपना आधार कार्ड और Reference Code को लेकर SBI के उस ब्रांच में जाना है जिस ब्रांच को अपने Select किया था वहां पर आपका बायोमेट्रिक Verification किया जायेगा जिसके बाद आपका Account Active हो जायेगा।

Features Of Yono SBI App

Digital तरीके हम थोड़ी ही देर में SBI Account खोल सकते है।

बिना किसी Paperwork के आप फ्री में Personal Loan Approved करवा सकते है।

एक ही Application पर आपको 14 अलग-अलग Category की सुविधा मिलती है।

इसमे 60 E-commerce Company है जिनकी Service का Use आप एक ही जगह कर सकते है।

Yono App को Ios और Android User भी Download कर सकते है।

Yono SBI App Ke Fayde

इस पर Account Open होने के बाद आपको बैंक की सारी Facility मिलेगी।

Account Open होने के बाद आपको Platinum कार्ड दिया जायेगा।

अगर आप Yono App से खाता खोलते है तो 5 लाख रूपये तक का दुर्घटना बीमा दिया जाता है।

Platinum Debit के जरिये आप एक दिन में 1 लाख रूपये तक निकल सकते है।

Conclusion

तो दोस्तों ये थी हमारी आज की पोस्ट Yono SBI App Kya Hai जिसमे हमने आपको Yono SBI App Me Account Kaise Open Kare की जानकारी को सरल भाषा में बताया हमे उम्मीद है की आपको हमारी पोस्ट ज़रुर पसंद आयी होगी।

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विपक्ष को पूछना चाहिए क्या हुआ घोषणापत्र का

सत्ताधारी दल के लिए अपने कामकाज की समीक्षा कोई आवश्यक राजनीतिक कार्य नहीं है. वह चाहे तो ऐसा कर सकती है या फिर ऐसा नहीं भी कर सकती है. अपना कार्य करते हुए सरकार के लिए जरूरी नहीं है कि अपने कार्यों का ब्यौरा भी दे. वह यह कह सकती है कि उसका काम बोल रहा है. उसका जिक्र अलग से क्यों करना?

लेकिन यह सुविधा विपक्ष के पास नहीं है. विपक्ष का यह अनिवार्य राजनीतिक कार्य है कि वह सरकार के कामकाज पर नजर रखे और बताए कि सरकार ने अपने किन चुनावी वादों को पूरा नहीं किया या किन वादों पर अब तक काम शुरू नहीं हुआ है.

ये भी पढ़ेंः नरेंद्र मोदी पर हमला कर कांग्रेस को विपक्ष की अगुआ के रूप में पेश कर रही हैं सोनिया गांधी

अभी की स्थिति यह है कि सरकार चुनींदा तौर पर ऐसे दावे कर रही है कि उसने क्या क्या काम कर लिए हैं. सरकार अपनी उपलब्धियों की चर्चा कर रही है, जो उचित भी है. लेकिन प्रचार के इस सरकारी अभियान को अभी चुनाव घोषणापत्र से असंबद्ध दिखाया जा रहा है.

अभी तक बीजेपी या सरकार की तरफ से वह पहली प्रचार सामग्री नहीं आई है, जिसमें बिंदुवार यह बताया गया हो कि सरकार ने अब तक किन-किन चुनावी वादों पर अमल कर लिया है. हालांकि इस बात की चर्चा है कि सरकार ऐसा कोई दस्तावेज या प्रचार अभियान शुरू करने वाली है.

इन वादों को पूरा किया कि नहीं

इस मामले में सरकार से भी ज्यादा निराश विपक्ष ने किया है. बीजेपी की सरकार वादों पर सवार होकर आई है. चुनाव से पहले बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने वादों और दावों की झड़ी लगा दी थी. इनमें से कुछ वादे इस तरह है. ये सभी वादे बीजेपी के 2014 लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र से निकले हैं. कायदे से विपक्ष को पूछना चाहिए कि –

1. देश में 100 नए स्मार्ट शहर कब तक बसाए जाएंगे?

2. देश के सबसे पिछड़े 100 जिलों को विकसित जिलों में शामिल होना था, वह काम कब शुरू होगा.

3. राष्ट्रीय वाइ-फाई नेटवर्क बनना था. वह काम कब शुरू होगा?

4. बुलेट ट्रेन की हीरक चतुर्भुज योजना का काम कहां तक आगे बढ़ा है?

5. कृषि उत्पाद के लिए अलग रेल नेटवर्क कब तक बनेगा?

6. हर घर को नल द्वारा पानी की सप्लाई कब तक शुरू होगी?

7. जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए विशेष न्यायालयों का गठन कब होगा?

8. बलात्कार पीड़ितों और एसिड अटैक से पीड़ित महिलाओं के लिए विशेष कोष कब तक बनेगा?

9. वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक सहायता देने के वादे का क्या हुआ?

10. किसानों को उनकी लागत का कम से कम 50% लाभ देने की व्यवस्था होने वाली थी. उसका क्या हुआ?

11. 50 टूरिस्ट सर्किट बनने वाले थे. कब बनेंगे?

12. अदालतों की संख्या दोगुनी करने के लक्ष्य का क्या हुआ?

13. न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की दिशा में पहला कदम कब उठाया जाएगा?

14. जजों की संख्या दोगुनी करने की दिशा में कितनी प्रगति हुई है?

15. फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को तीन हिस्सों में बांटने की योजना का क्या हुआ?

16. महिला आईटीआई की स्थापना कब होगी?

17. महिलाओं द्वारा संचालित बैंकों की स्थापना होनी थी. ऐसे कितने बैंक बने?

18. हर राज्य में एम्स जैसे संस्थानों की स्थापना होनी थी. कितने राज्यों में इनका काम शुरू हुआ है? बाकी राज्यों में कब काम शुरू होगा?

19. बैंकों के खराब कर्ज यानी एनपीए को कम करने की सरकार के पास क्या योजना है?

20. नदियों को साफ करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के काम में कितनी प्रगति हुई है?

चुनावी वादों को जनता की नजर में लाने का काम विपक्ष का

बीजेपी के घोषणापत्र में ऐसा बहुत कुछ है, जिस पर अब तक काम शुरू नहीं हुआ है. लेकिन आप पाएंगे कि विपक्ष ने अब तक घोषणापत्र के अध्ययन और वास्तविकता से साथ उसे मिला कर देखने का काम शुरू भी नहीं किया है. विपक्ष की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती है कि विपक्ष में कितने सांसद हैं.

ये भी पढ़ेंः क्या किसान हैं इस देश का नया विपक्ष!

केंद्र में 1984 के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है और विपक्षी सांसदों की समस्या इतनी कम है कि वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तक नहीं बना पाया. लेकिन संख्या ही सबकुछ नहीं है.

विपक्ष अपनी अर्थवत्ता साबित करने के लिए एक पहरेदार यानी वाचडॉग की भूमिका निभानी चाहिए. उसे सरकार के हर काम पर नजर रखनी चाहिए और जहां भी कोई कमी या गड़बड़ी दिखे, उसे चिन्हित करना चाहिए.

सरकार अगर अपने चुनावी वादे पूरा नहीं कर रही है, तो इसे जनता की नजर में लाने का काम विपक्ष का है. स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. लेकिन यह तभी है, जब वह अपनी भूमिका निभाए. अगर विपक्ष भी सत्ताधारी दल के चुनाव घोषणापत्र पर नजर नहीं रखेगा, तो यह काम कौन करेगा?

मोदी जी के सभी जुमले तैयार करती है ये टीम, बदले में लेती है मोटी रकम

मोदी जी जो अक्सर जुमले बोलते हैं, वो उनके नहीं बल्कि उनकी टीम ने लिखे होते हैं

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी उर्फ मोदी जी अपने भाषण के लिए बहुत फेमस हैं। उनके भाषण में दिए गए जुमले तो ऐसे हैं कि कई बार उनकी ही जुमलों पर खिचाई हो जाती है। चाहे 2014 लोकसभा इलेक्शन से पहले मोदी जी का 15 लाख रुपये वाला जुमला हो या फिर हाल ही में बेंगलुरु में मोदी जी का नया जुमला ‘टॉप (TOP)’। टॉप (TOP- Tomato, onion & potato ) यानि टमाटर, आलू और प्याज। इससे पहले भी मोदी जी के कई जुमले ट्रेंड में रहे हैं। अब ऐसे में दिमाग में आता है कि ऐसे जुमले मोदी जी अपने दिमाग में लाते कहां से हैं? उनका दिमाग इतनी क्रिएटिविटी कैसे करता है? तो आपको बता दें कि मोदी ने इन जुमलों के लिए अपनी एक टीम रखी हुई है। जिसका काम इस तरह के जुमले बनाना हैं।

Modi and his team

– पीएम बिना देखे भाषण दे ऐसा हर बार जरूरी नहीं हैं। हां इस बात को भी नहीं झुठला सकते कि पीएम कई बार बिना देखे बोलते हैं लेकिन उनकी टीम में काम करने वाले एक कर्मचारी बताते हैं कि अगर मोदी जी सीधा देखकर भाषण दे रहे हैं, तो वह बिना देखें बोल रहे हैं। लेकिन अगर वह बाएं या दाएं देख कर बोल रहे हैं, तो वह टेलीप्रॉम्पटर का इस्तेमाल कर रहे हैं।

Modi and his team

जैसे मोदी जी के ये जुमले काफी फेमस हुए…

GST: गुड एंड सिंपल टैक्स = ग्रोइंग स्ट्रॉन्गर टुगेदर ।

SCAM: सपा, कांग्रेस, अखिलेश यादव और मायावती।

BHIM: भारत इंटरफेस फॉर मनी , डिजिटल ट्रांजेक्शन के लिए बनी इस ऐप को डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर बना गया है।

VIKAS: विद्युत, कानून और सड़क को मिलाकर बना विकास।

ABCD: आदर्श, बोफोर्स, कोयला और दामाद।

Modi and his team
आइए आपको बताते हैं कि कौन है मोदी जी के जुमलों के पीछे-

1. यश गांधी, नीरव के. शाह
– ये दोनों शख्स गुजराती हैं। इसके अलावा दोनों ही पीएमओ में रिसर्च ऑफिसर हैं। दोनों ही पीएम के भाषण के लिए सभी इनपुट देते हैं। यही नहीं ये दोनों शख्स पीएम के ट्विटर और फेसबुक भी देखते हैं।

2. प्रतीक दोषी (ओएसडी- रिसर्च एंड स्ट्रैटजी)

प्रतीक नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर से पढ़े हुए हैं। वह साल 2007 में मोदी से जुड़े हुए हैं। वे मोदी सरकार के लिए भाषणों के लिए पूरी तरह से रिसर्च करते हैं।

3.जगदीश ठक्कर ये पीएम के पीआरओ हैं। यानि पब्लिक रिलेशन ऑफिसर जिनका काम मीडिया और बाकी ब्रैंडिंग करना होता है। जगदीश ठक्कर जब मोदी सीएम थे तब भी उनके पीआरओ थे।

4. हिरेन जोशी (ओएसडी-आईटी) – हिरेन जोशी राजस्थान विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रॉनिक्स-कम्युनिकेशन के प्रोफेसर हैं। वे उनके सोशल मीडिया को देखते हैं और कम से कम शब्दों में अपनी सारी बातें सोशल मीडिया पर पहुंचा देते हैं। जैसे उन्होंने एक योजना ऐसी दी है जिसमें पीएम के साथ-साथ बीजेपी का नाम भी इस्तेमाल किया है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना यानी पीएमबीजेपी

अब अधिकारियों से पूछेगी बिहार सरकार, किस सेक्टर में करेंगे काम

राज्य सरकार प्रशिक्षित अधिकारियों की तैयार करा रही है डायरेक्टरी, सभी विभागों को भेजी जायेगी सरकार चाहती है अधिकारियों को रुचि के अनुसार मिले प्रशिक्षण राजेश कुमार सिंह पटना : अधिकारियों की पोस्टिंग से पहले सरकार पूछेगी कि वह किस सेक्टर में काम करना चाहते हैं. सरकार इसकी तैयारी करीब-करीब पूरी कर चुकी है. दरअसल, सरकार चाहती है कि अधिकारियों को उनकी रुचि के अनुसार उन्हें प्रशिक्षण दिया जाये. इससे सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर मॉनीटरिंग तक में फायदा मिलेगा. अधिकारी भी रुचि लेकर सरकारी योजनाओं को आगे बढ़ायेंगे और धरातल पर इसका लाभ नजर आयेगा. इसमें ऐसे पदाधिकारियों को रखा जायेगा, जिन्हें सरकार की ओर से प्रशासकीय प्रबंधन कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण दिया गया है. अब तक चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान में 150 से अधिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है. प्रशिक्षण लेने वाले सभी पदाधिकारियों की सूची बनायी जा रही है. पूरा प्रोफाइल सभी विभागों को उपलब्ध कराया जायेगा.बनेगी डायरेक्टरी : सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से प्रशिक्षण पाने वाले पदाधिकारियों की डायरेक्टरी बनायी जायेगी. इसमें संबंधित पदाधिकारी का पूरा प्रोफाइल होगा. इसमें प्रशिक्षण से संबंधित बिंदुओं का विवरण होगा, ताकि एक नजर में यह जानकारी मिल सके कि संबंधित पदाधिकारी की रुचि आखिर किस सेक्टर में है. इसको लेकर सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव आमिर सुबहानी ने निर्देश जारी कर दिया है. सात निश्चय में मिलेगा लाभ सामान्य प्रशासन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रशिक्षण पाने वाले पदाधिकारियों का सबसे ज्यादा उपयोग सात निश्चय योजनाओं में होगा. दरअसल, मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना को लेकर सभी विभाग अलर्ट हैं. सात निश्चय के तहत मुख्यमंत्री ने मूलभूत सुविधाओं को घर-घर तक पहुंचाने की योजना बनायी है. इसके अलावा रोजगार और शिक्षा को भी स्थान दिया गया है. सात निश्चय के तहत होने वाले कार्यों में दर्जन भर से अधिक विभाग सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं. इन विभागों के स्तर से तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं. बिहार विकास मिशन की बैठक में इनकी समीक्षा भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्तर से की जाती है. इसके अलावा समय-समय पर मुख्य सचिव दीपक कुमार भी समीक्षा कर अधूरे कार्यों को तेजी से पूरा करने पर बल देते रहते हैं. इन योजनाओं में प्रशिक्षित पदाधिकारियों की पोस्टिंग से हर स्तर पर लाभ मिलेगा. योजनाओं को धरातल पर बेहतर तरीके से उतारने में सरकार को मदद मिलेगी. इसका लाभ जनता को मिलेगा. सरकार का काम बदला है. विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लोक प्रबंधन का काम जुड़ा है. प्रबंधन का सिद्धांत प्रशासन में भी लागू होता है. इससे लक्ष्य पाने में आसानी होती है. परिणाम भी बेहतर होते हैं. इसलिए नयी व्यवस्था की जा रही है. जो भी पदाधिकारी होंगे, उन्हीं से पूछा जायेगा कि वह किस सेक्टर में काम करेंगे. इसी के हिसाब से पोस्टिंग होगी. मॉडर्न मैनेजमेंट सीखने वाले सभी पदाधिकारियों का पूरा बायोडाटा और प्रोफाइल तैयार करायी जा रही है. सभी विभागों को इसे भेजा जायेगा. खास बात यह है कि इन पदाधिकारियों का लाभ सात निश्चय योजनाओं में भी मिलेगा. बिहार सरकार इंप्लाई ऑर्गेनाइजशनों को डायरेक्ट्री उपलब्ध करायेगी. – आमिर सुबहानी, अपर मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन

कांग्रेस ने एक वादा पूरा किया

ना मंत्रियों का शपथ ग्रहण ना कैबिनेट की बैठक । सत्ता बदली और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही किसानो की कर्ज माफी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये । ये वाकई पहली बार है कि राजनीति ने इक्नामी को हडप लिया या फिर राजनीतिक अर्थशास्त्र ही भारत का सच हो चला है ।

और राजनीतिक सत्ता के लिये देश की इक्नामी से जो खिलवाड बीते चार बरस में किया गया उसने विपक्ष को नये संकेत यही दे दिये कि इक्नामी संभलती रहेगी पहले सत्ता पाने और फिर संभालने के हालात पैदा करना जरुरी है ।

हुआ भी यही कर्ज में डूबे मध्यप्रदेश और छत्तिसगढ की सत्ता पन्द्रह बरस बाद काग्रेस को मिली तो बिना लाग लपेट दस दिनो में कर्ज माफी के एलान को दस घंटे के भीतर कर दिखाया और वह सारे पारंपरिक सवाल हवा हवाई हो गये कि राज्य का बजट इसकी इजाजत देता है कि नहीं ।

दरअसल , मोदी सत्ता ने जिस तरह सरकार चलायी है उसमें कोई सामान्यजन भी आंखे बंद कर कह सकता है कि नोटबंदी आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक फैसला था । जीएसटी जिस तरह लागू किया गया वह आर्थिकनहीं राजनीतिक फैसला है ।

रिजर्व बैक में जमा तीन करोड रुपया बाजार में लगाने के लिये मांग करना भी आर्थिक नहीं राजनीतिक जरुरत है। पहले दो फैसलो ने देश की आर्थिक कमर को तोडा तो रिजर्व बैक के फैसले ने ढहते इकनामी को खुला इजहार किया ।

कांग्रेस ने निभाया अपना सबसे बड़ा वादा, कुर्सी संभालते ही ‘कमलनाथ’ ने किसानों के कर्ज किये माफ़

फिर बकायदा नोटबंदी और जीएसटी के वक्त मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमणयम ने जब पद छोडा तो बकायदा किताब [ आफ काउसंल, द चैलेजआफ मोदी-जेटली इक्नामी ] लिखकर दुनिया कोबताया कि नोटबंदी का फैसला आर्थिक विकास के लिये कितना घातक था । और जीएसटी नेइक्नामी को कैसे उलझा दिया ।

तो दूसरी तरफ काग्रेस के करीबी माने जाने वाले रिजर्व बैक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन का मानना है कि किसानो की कर्ज माफी से किसानो के संकट दूर नहीं होगें । और संयोग से जिस दिन रधुरामराजन ये कह रहे थे उसी दिन मध्यप्रदेश में कमलनाथ तो छत्तिसगढ में भूपेश बधेल सीएम पद की शपथ लेते ही कर्जमाफी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहे थे ।

तो सवाल तीन है । पहला , क्या राजनीति और इक्नामी की लकीर मिट चुकी है । दूसरा , क्या 1991 की लिबरल इक्नामी की उम्र अब पूरी हो चुकी है । तीसरा , क्या ग्रामिण भारतके मुश्किल हालात अब मुख्यधारा की राजनीति को चलाने की स्थिति में आ गये है ।

ये तीनो सवाल ही 2019 की राजनीतिक बिसात कुछ इस तरह बिछा रहे है जिसमें देश अब पिछे मुडकर देखने की स्थिति में नहीं है । और इस बिसात पर सिर्फ 1991के आर्थिक सुधार ही नहीं बल्कि मंडल-कंमडल से निकले क्षत्रपो की राजनीति भी सिमट रही है ।

पर कैसे राजनीति और अर्थव्यवस्था की लकीर मिटी है और वैकल्पिक राजनीतिक अर्थसास्त्र की दिशा में भारत बढ रहा है ये काग्रेस के जरीये बाखूबी समझा जा सकता है । काग्रेस मोदी सत्ता के कारपोरेट प्रेम को राजनीतिक मुद्दा बनाती है ।

कमलनाथ ने 1 घंटे में ही किसानों का कर्ज माफ कर दिया मगर मोदी ने 5 साल में एक भी ‘वादा’ नहीं पूरा किया : आचार्य प्रमोद

किसानो की कर्ज माफी और छोटे और मझौले उघोगो के लिये जमीन बढानेऔर मजदूरो के हितो के सवाल को मनरेगा से आगे देखने का प्रयास कर रही है । जबकि इन आधारो का विरोध मनमोहन इक्नामिक्स ने किया । लेकिन अब काग्रेस कृर्षि आर्थसास्त्र को समझ रही है लेकिन उसके पोस्टर ब्याय और कोई नही मनमोहन सिंह ही है ।

यानी तीन राज्यो में जीत के बाद करवट लेती राजनीति को एक साथ कई स्तरपर देश की राजनीति को नायाब प्रयोग करने की इजाजत दी है । या कहे खुद को बदलने की सोच पैदा की है । पहले स्तर पर काग्रेस रोजगार के साथ ग्रोथ को अपनाने की दिशा में बढना चाह रही है ।

क्योकि लिबरल इक्नामी के ढाचे को मोदी सत्ता ने जिस तरह अपनाया उसमें ‘ ग्रोथ विदाउट जाब ‘ वाले हालात बन गये । दूसरे स्तर पर विपक्षकी राजनीति के केन्द्र में काग्रेस जिस तरह आ खडी हुई उसमें क्षत्रपो के सामने ये सवाल पैदा हो चुका है कि वह बीजेपी विरोध करते हुये भी बाजी जीत नहीं सकते । उन्हे काग्रेस के साथ खडा होना ही होगा ।

और तीसरे स्तर पर हालात ऐसे बने है कि तमाम अंतर्विरोध को समेटे एनडीए था जिसकी जरुरत सत्ता थी पर अब यूपीए बन रहा है जिसकी जरुर सत्ता से ज्यादा खुद की राजनीतिक जमीन को बचाना है । और ये नजारा तीन राज्यो में काग्रेस के शपथ ग्रहण के दौरान विपक्ष की एक बस में सवार होने से भी उभरा औरमायावती, अखिलेश और ममता के ना आने से भी उभरा ।

दरअसल, मोदी-शाह की बीजेपी ममता बर क्षत्रपो की राजनीतिक जमीन को सत्ता की मलाई और जांच एंजेसियो की धमकी के जरीये तरह खत्म करना शुरु किया । तो क्षत्रपो के सामने संकट है कि वह बीजेपी के साथ जा नहीं सकते और काग्रेस को अनदेखा कर नहीं सकते । लेकिन इस कडी में समझना ये भी होगा कि काग्रेसका मोदी सत्ता या कहे बीजेपी विरोध पर ही तीन राज्यो में काग्रेस की जीत का जनादेशहै । और इस जीत के भीतर मुस्लिम वोट बैक का खामोश दर्द भी छुपा है ।

कर्ज माफी से ओबीसी व एससी-एसटी समुदाय की राजत भी छुपी है और राजस्थान में जाटो का पूर्ण रुपसे काग्रेस के साथ आना भी छुपा है । और इसी कैनवास को अगर 2019 की बिसात पर परखे तो क्षत्रपो के सामने ये संकट तो है कि वह कैसे काग्रेस के साथ काग्रेस की शर्ते पर नहीं जायेगें।

मध्यप्रदेश में किसानों की कर्ज माफ़ी पर बोले राहुल गांधी- अब छत्तीसगढ़ और राजस्थान की बारी है

क्योकि काग्रेस जब मोदी सत्ता के विरोध को जनादेश में अपने अनुकुल बदलने में सफल हो रही है तो फिर क्षत्रपो के सामने ये चुनौती भी है कि अगर वह काग्रेस के खिलाफ रहते है तो चाहे अनचाहे माना यही जायेगा कि वह बीजेपी के साथ है ।

उस हालात में मुस्लिम , दलित , जाट या कर्ज माफी से लाभ पाने वाला तबको क्षत्रपो का साथ क्यो देगा । यानी तमाम विपक्षी दलो की जनवरी में होने वाली अगली बैठक में ममता , माया औरअखिलेश भी नजर आयेगें ।

और अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह कैसे अपने सहयोगियोको साथ रखे और कैसे लिबरल इक्नामी का रास्ता छोड वैकल्पिक आर्थिकमाडल को लागू करने के लिये बढे । यानी 2019 का राजनीतिकअर्थशास्त्र अब इबारत पर साफ साफ लिखी जा रही है कि कारपोरेट को मिलने वाली सुविधा या रियायत अब ग्रमीण भारत की तरफ मुडेगी ।

यानी अब ये नहीं चलेगा कि उर्जित पटेल ने रिजर्व बैक के गवर्नर पद से इस्तिफा दिया तो शेयर बाजार सेसंक्स को कारपोरेट ने राजनीतिक तौर पर शक्तिकांत दास के गवर्नर बनते ही संभाल लिया क्योकि वह मोदी सत्ता के इशारे पर चल निकले । और देश को ये मैसेज दे दिया गया कि सरकार की इक्नामिक सोच पटरी ठीक है उर्जित पटेल ही पटरी पर नहीं थे ।

कांग्रेस का हौसला बढ़ा राहुल गांधी ने साबित किया वो क्या है

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की हार तय थी, क्योंकि दोनों राज्यों में वह 15 साल से सत्ता में थी. इसलिए सत्ता विरोधी लहर से उसका बचना मुश्किल था. राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की खराब मैनेजमेंट स्किल और पार्टी की अंदरूनी कलह के चलते भी बीजेपी की हार तय थी. वैसे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस कलह को दूर करने की भरसक कोशिश की थी. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो राजस्थान में बीजेपी की कहीं बड़े अंतर से हार होती.

कांग्रेस का हौसला बढ़ा

इन नतीजों का एक असर यह हुआ है कि अब कांग्रेस 2019 लोकसभा चुनाव में 120 से अधिक सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है, जो अभी की तुलना में तीन गुना अधिक है. दूसरा असर यह है कि इन राज्यों में कांग्रेस नेताओं के बीच मुख्यमंत्री बनने के लिए खींचतान शुरू होगी. तीसरा, मुख्यमंत्री जो भी बने, उस पर लोकसभा चुनाव के लिए फंड जुटाने का दबाव बनेगा.

चौथी बात यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पुलिस पर नियंत्रण का संघर्ष भी शुरू होगा. इन दोनों राज्यों की पुलिस को पिछले 15 साल से काम के अलग तरीके की आदत पड़ चुकी है. पुलिस पर कंट्रोल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका 2019 लोकसभा चुनाव में बड़ा रोल होगा. पांचवां, इन राज्यों और केंद्र सरकार के बीच अचानक टकराव बढ़ेगा, जिससे आर्थिक फैसले लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.

हार का छठा और महत्वपूर्ण पर अस्थायी असर यह होगा कि अयोध्या में राम मंदिर बनवाने का दबाव बढ़ जाएगा, क्योंकि इससे यूपी में बीजेपी की जीत और 2019 में उसके कोर वोट बैंक में सेंध रुक सकती है.

इन नतीजों में बीजेपी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए कुछ संदेश भी छिपे हैं. बीजेपी को समझना होगा कि हिंदी पट्टी में भी हिंदुत्व का एक हद तक ही असर हो सकता है. 80 पर्सेंट भारतीय भले ही हिंदू हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे उन अतिवादी तरीकों का समर्थन करते हैं, जिन पर बीजेपी 2014 के बाद से चल रही है.

 कांग्रेस में खुशी की लहर
कांग्रेस में खुशी की लहर
(फाइल फोटोः PTI)

‘हम सब हिंदू हैं’ वाली सोच नहीं चलेगी

उधर, गैर-हिंदीभाषी राज्यों में इन मुद्दों की हमेशा ही कम अपील रही है. बीजेपी को समझना होगा कि देश के सिर्फ सात राज्य हिंदी भाषी हैं. 22 राज्य इससे बाहर हैं. इसलिए ‘हम सब हिंदू हैं’ वाला तरीका काम नहीं करेगा.

अब मोदी और शाह पर आते हैं. सत्ता विरोधी लहर को लेकर दोनों कुछ नहीं कर सकते थे, लेकिन पिछले साल गुजरात और कर्नाटक के बाद उन्होंने अपना तौर-तरीका बदला था.

पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों के बावजूद नहीं चला बीजेपी का जादू
पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों के बावजूद नहीं चला बीजेपी का जादू
(फोटो: ट्विटर\@narendramodi)

हालांकि इन नतीजों को देखकर लगता है कि इसमें बहुत बदलाव नहीं आया है. दोनों ने पहली गलती प्रत्याशियों के चुनाव को लेकर की, जो कांग्रेस हमेशा से करती आई है. इस मामले में मोदी-शाह ने सबसे बड़ी गलती 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में की थी, लेकिन 2017 में यूपी में ऐतिहासिक जीत के बाद उन्हें शायद लगा कि एक हार मायने नहीं रखती. उन्हें याद रखना होगा कि खास तौर पर विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों की बड़ी अहमियत होती है.

कांग्रेस के लिए दिल्ली दूर है

बेशक इस जीत से कांग्रेस के हौसले बढ़े हैं, लेकिन उसके लिए दिल्ली दूर है. बीजेपी 2019 में अभी भी सबसे बड़ी पार्टी होगी, भले ही वह बहुमत से काफी पीछे रह जाए. बीजेपी के लिए असल मुद्दा यह है कि क्या उसे मोदी-शाह की जोड़ी के साथ बने रहना चाहिए या नई लीडरशिप की तलाश करनी चाहिए. अब तक इन दोनों का कद वाजपेयी-आडवाणी जितना बड़ा नहीं हुआ है.

अगर 2019 में पार्टी की सीटें 100 से अधिक कम होती हैं, तो उन्हें ढूंढने से दोस्त नहीं मिलेंगे. आने वाला वक्त दिलचस्प होगा, खासतौर पर राजनीतिक तौर पर. बदकिस्मती की बात यह है कि दिलचस्प सियासत का दौर अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता.

जयोतिरादित्य सिंधिया

जयोतिरादित्य सिंधिया ने शिवराज सिंह चौहान पर तंज कसते हुए कहा, ”मैं अब कहूंगा- माफ़ कीजिए शिवराज जी अब आया है जनता का राज.”

दरअसल, शिवराज सिंह चौहान ने पूरा कैंपेन ‘माफ़ कीजिए महाराज, मेरा नेता शिवराज’ के नारे पर चलाया था. शिवराज सिंह चौहान ने महाराज कह सिंधिया परिवार को निशाने पर लेने की कोशिश की थी.

मुख्यमंत्री बनने के सवाल पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि कांग्रेस आलाकमान का जो भी निर्णय होगा, उसे वो स्वीकार करेंगे. उन्होंने कहा, ”हमलोग इस माटी को सिर पर लगाकर पांच सालों तक जनता की सेवा करेंगे.”

बीएसपी को दो सीटों पर जीत मिली है, एक पर समाजवादी पार्टी और चार पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं. वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी कि मध्य प्रदेश कांग्रेस के तीनों बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने मंगलवार रात ढाई बजे प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि उन्होंने राज्यपाल के पास सरकार बनाने के लिए चिट्ठी भेजी है.

कांग्रेस मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. समाजवादी पार्टी ने उसे समर्थन देने की घोषणा की है. मायावती ने भी कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा कर दी है. मतलब कांग्रेस एसपी और बीएसपी के समर्थन से बहुमत साबित कर सकती है.

तीनों पार्टियों मिलकर 117 के आंकड़े छू लेंगी जो साधारण बहुमत से एक सीट ज़्यादा होगी. कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने बीबीसी से कहा कि चारों निर्दलीय विधायक कांग्रेस के बाग़ी हैं और उनका समर्थन भी उन्हें मिल गया है.

मध्य प्रदेश में बीजेपी पिछले 15 सालों से सत्ता में थी और शिवराज सिंह चौहान 13 सालों से मुख्यमंत्री. मध्य प्रदेश में अगर सत्ता विरोधी लहर थी तो भी कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रही. कांग्रेस से पांच विधायक कम होने के बावजूद मध्य प्रदेश में बीजेपी को कुल वोट कांग्रेस से ज़्यादा मिले हैं.
मध्य प्रदेश कांग्रेस बुधवार को दोपहर बाद बैठक करने जा रही है. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा है. नतीजे आने के बाद बीजेपी पसोपेश में थी. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के एक ट्वीट से और भ्रम बढ़ गया था. उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि बीजेपी निर्दलीय विधायकों के संपर्क में है. हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस्तीफ़े की बात कह स्थिति साफ़ कर दी.

मध्य प्रदेश में बीजेपी अपनी जीत को लेकर सबसे ज़्यादा आश्वस्त दिख रही थी. यहां तक की एग्ज़िट पोल में भी बीजेपी की जीत दिखाई जा रही थी, लेकिन कांग्रेस ने इस बार के चुनाव में एकजुटता दिखाई और बीजेपी को हराने में कामयाब रही.

बीजेपी की मुश्किलें बड़ी

2018 विधानसभा चुनाव नतीजों के कई बड़े सिग्नल निकलकर सामने आ रहे हैं. सबसे पहली बात ये कि छत्तीसगढ़, राजस्थान के नतीजों ने साबित किया है कि बीजेपी की निगेटिव ब्रांडिंग के बावजूद राहुल गांधी चमके हैं. बीजेपी के नाॅर्थ इंडिया जनाधार में कांग्रेस ने सेंध लगा दी है. हालांकि कांग्रेस को आंतरिक गुटबंदियों पर जीत पाने की जरूरत होगी.

इस चुनाव ने यूपी के लिए सबक दिया है. नतीजों ने साफ संकेत दिए हैं कि बीजेपी से मुकाबला करने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को गठजोड़ की राजनीति, सीट बंटवारे को लेकर सफाई की जरूरत है. 2019 में देश गठजोड़ की राजनीति में वापसी करेगा.

नतीजे के बाद बीजेपी के लिए कई सवाल खड़े हो गए हैं. खासकर छत्तीसगढ़ में गरीब, पिछड़े इलाकों में बीजेपी का वोट शेयर गिरा है. हालांकि शहरी इलाकों में इनकी पकड़ बरकरार है. उज्‍ज्‍वला, मुद्रा, फसल बीमा जैसी योजनाओं का लाभ बीजेपी को नहीं मिल पाया. साफ है कि गांव, गरीब, किसान, बेरोजगार युवा और दलितों के मुद्दे, बीजेपी के लिए ये 5 बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं.

The quint

Kcr की शानदार जीत से खुश मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे के.टी. रामा राव ने एक बार फिर से सेवा करने का मौका देने पर राज्य की जनता का आभार जताया।

हैदराबाद, 11 दिसंबर (आईएएनएस)| तेलंगाना विधानसभा चुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की बड़े पैमाने पर जीत से खुश मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के बेटे के.टी. रामा राव ने एक बार फिर से सेवा करने का मौका देने पर राज्य की जनता का आभार जताया।

पिता के कैबिनेट में मंत्री रामा राव ने ट्वीट किया, “आभारी, कृतज्ञ और विनीत। केसीआर गरु पर भरोसा बनाए रखने और आपकी सेवा करने के लिए हमें एक और मौका देने के लिए तेलंगाना का धन्यवाद।”

केटीआर के रूप में लोकप्रिय रामा राव सिर्सिल्ला सीट से जीत की ओर बढ़ते मालूम पड़ रहे हैं।

केसीआर के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने वाले युवा नेता के तेलंगाना राष्ट्र समिति के मुख्यालय पहुंचने पर सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार ढंग से स्वागत किया।

ऊर्जित पटेल का इस्तीफा

रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया है. 1990 के बाद वो पहले गवर्नर हैं जिन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया. उनका 3 साल का कार्यकाल सितंबर 2019 में पूरा होना वाला था. उर्जित पटेल ने निजी कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया है बता दें कि कुछ महीनों से रिजर्व बैंक और सरकार के बीच बड़ा मतभेद चल रहा था. अब 14 दिसंबर को रिजर्व बैंक बोर्ड की बैठक के पहले गर्वनर के इस्तीफे से सवाल उठ रहे हैं. रिजर्व बैंक एक्ट के सेक्शन -7 के तहत सरकार उन पर अपनी बात मनवाने का दवाब डाल रही थी

सरकार और रिजर्व बैंक के बीच विवाद के मुद्दे

  • रिजर्व बैंक सरकार को स्पेशल डिविडेंड दे, रिजर्व बैंक से करीब 3 लाख करोड़ रुपए मांगने की बात सामने आई थी
  • NBFC और छोटी इंडस्ट्री कों आसान कर्ज देने का सरकार की तरफ दबाव
  • आरबीआई बोर्ड के रोल को लेकर सवाल. बोर्ड रिजर्व बैंक गवर्नर के अधिकारों में कटौती करना चाहता था

उर्जित पटेल ने इस्तीफे पर क्या कहा?

निजी कारणों से मैं अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे रहा हूं. रिजर्व बैंक में कई सालों से अलग-अलग पदों पर रहकर काम करना मेरे लिए बहुत सम्मान की बात है. रिजर्व बैंक के कर्मचारियों, अधिकारियों और मैनेजमेंट का जो साथ मिला उसके लिए आभारी हूं. सबकी इसी कड़ी मेहनत की वजह से रिजर्व बैंक इतना काम कर पाया. मैं इस मौके पर रिजर्व बैंक बोर्ड के सभी डायरेक्टर और अपने साथियों का शुक्रिया अदा करता हूं. उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं.
उर्जित पटेल, गवर्नर

नोटबंदी से करीब 2 महीने पहले अगस्त, 2016 में उर्जित पटेल को रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाने का ऐलान किया गया था. इससे पहले वो डिप्टी गवर्नर थे. बता दें कि वो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के छात्र रहे हैं. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के करीबी सहयोगी भी माने जाते हैं.

किसने क्या कहा?

  • RBI गवर्नर को जिस तरीके से हटने के लिए मजबूर किया गया, वो भारत की मॉनेटरी और बैंकिंग सिस्टम के लिए काला धब्बा है : कांग्रेस
  • देश में वित्तीय आपातकाल: ममता बनर्जी
  • उर्जित पटेल एक साफ छवि वाले और प्रोफेशनल शख्स हैं, उन्होंने RBI को बतौर गवर्नर और डिप्टी गवर्नर 6 साल सेवा दी है, वो महान विरासत छोड़कर जा रहे हैं, हमें उनकी कमी खलेगी: पीएम मोदी
  • रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इसलिए इस्तीफा दिया क्योंकि वो इस संस्था को बचाए रखना चाहते थे, लेकिन वो नहीं कर सके. मुझे गर्व है ऐसे लोगों पर जो सरकार के खिलाफ ऐसी चीजों के लिए खड़े होते हैं: राहुल गांधी

देश की आजादी से आज तक कोई डाक्टर नहीं पहुंचा है इस गांव में

राजस्थान के रेतीले इलाकों के बाकी गांवों जैसा है. जीने के लिए हर जरूरी सुविधाओं से दूर, बहुत दूर.

राजस्थान के चुनावी कवरेज के लिए जब क्विंट की टीम जैसलमेर के इन इलाकों में थी तब यहां के लोगों ने बॉर्डर के करीब गांव के लोगों के स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में बताया. यहां सबसे ज्यादा महिलाओं के लिए मुश्किलें हैं.

बच्चे को जन्म देना यहां सबसे मुश्किल

गांव की अन्या बताती हैं कि इस गांव में महिलाओं के लिए सबसे मुश्किल दौर प्रसव का होता है.

पहली बात तो यहां 25 किलोमीटर तक कोई हॉस्पिटल नहीं ही, गांव में सिर्फ एक सब हेल्थ सेंटर है. एक नर्स हैं वो अगर छुट्टी पर चली जाती हैं तो फिर हमें 65 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. लेकिन इसके लिए एम्बुलेंस नहीं है. एम्बुलेंस आए भी कैसे मोबाइल का नेटवर्क यहां नहीं मिलता है. और अगर फोन लग भी गया तो शहर से एम्बुलेंस आने में बहुत वक्त लगता है. अब आप ही बताइए औरत अपना दर्द देखे या ये सब समझे.

जब हमने ये सारी बातें सुनी तो सोचा क्यों ना हेल्थ सेंटर भी देख लें. हेल्थ सेंटर में हमारी मुलाकात एएनएम दनपति से हुई. दनपति बताती हैं,

इस सब सेंटर पर मैं सिर्फ एक ANM हूं और यहां की जो पोपुलेशन है वो 900 से थोड़ी ऊपर है. अभी तो मुझे एक लेबर टेबल मिली है. एक IV स्टैंड मिला है. एक बेड और एक गद्दा. इस टाइम चार्ज में तो बस ये मिला था. उसके बाद एक सिस्टर ने 4 कुर्सियां लाकर दी और थोड़ा स्टेशनरी का समान.

नेताओं का पता नहीं, इलाज राम भरोसे

गांव के ही सिब्बल सिंह कहते हैं कि चुनाव का वक्त है तो नेता लोग आ जाएंगे लेकिन उसके अलावा कोई नहीं पूछता. अन्या से नेताओं के बारे पूछते ही कहती हैं कि वोट यहां घर वालों के कहने पर दिया जाता है. पूरा इलाका एक फैसला करेगा कि किसे वोट देना है. बस सब उसी के पीछे वोट देंगे. इसलिए नेताओं को फर्क नहीं पड़ता है.

बच्चों में उम्मीद, गांव में होगा अस्पताल

हेल्थ सेंटर के पास के स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों से जब हमने पूछा कि आपको बड़े होकर क्या बनना है तो उनमे से ज्यादातर का जवाब था ‘डॉक्टर’. क्योंकि इन्हें लगता है कि इनके पढ़ लेने से गांव में अस्पताल बन सकता है.

CBI Vs CBI: आलोक वर्मा पर SC ने फैसला सुरक्षित रखा, बहस हुई पूरी

CBI Vs CBI: आलोक वर्मा पर SC ने फैसला सुरक्षित रखा, बहस हुई पूरी

सीबीआई के दो बड़े अफसरों के विवाद पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में बहस पूरी हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा पर फैसला सुरक्षित रख लिया है. बुधवार को शुरू हुई यह सुनवाई गुरुवार तक चली. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जमकर फटकार लगाई. कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि आलोक वर्मा के अधिकार क्यों छीने गए. यह ऐसा मुद्दा नहीं था कि सरकार को अचानक बिना सलेक्शन कमिटी से बातचीत किए सीबीआई डायरेक्टर की पॉवर खत्म करने का फैसला लेना पड़े.

कानून के बेहतर पालन का निर्देश

चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि सीबीआई के दो अफसरों का विवाद पिछले तीन महीने से चल रहा था. इसीलिए केंद्र सरकार को रातोंरात सीबीआई डायरेक्टर की पॉवर छीनने से पहले चयन समिति की इजाजत लेनी चाहिए थी. अगर ऐसा होता तो इसे कानून का बेहतर तौर पर पालन माना जाता.

सीवीसी ने भी दिया जवाब

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील देते हुए कहा, असाधारण परिस्थितियों के लिए असाधारण उपायों की ही जरूरत है. सीवीसी की तरफ से सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीबीआई को संचालित करने वाले कानूनों का जिक्र करते हुए कहा कि सीबीआई पर आयोग की निगरानी के दायरे में इससे जुड़ी आश्चर्यजनक और असाधारण परिस्थितियां भी सामने आती हैं.

क्या हुआ था बुधवार को

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जवाब देते हुए कहा था कि, अलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच का विवाद काफी तूल पकड़ रहा था और यह एक पब्लिक डिबेट का मुद्दा बन चुका था. भारत सरकार इस बात से हैरान थी कि सीबीआई के ये दो बड़े अधिकारी क्या कर रहे हैं. दोनों बिल्लियों की तरह झगड़ रहे थे.

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यूपी फायर। ब्रांड दलित नेता सावित्री बाई फुले ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.

यूपी के बहराइच से बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. वह पार्टी की नीतियों से असंतुष्ट है. फुले ने कहा कि बीजेपी समाज को बांटने की कोशिश कर रही है.सावित्री बाई फुले ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देते हुए कहा कि बीजेपी देश को मनुस्मृति से चलाना चाहती है. उन्होंने कहा कि भाजपा दलित, पिछड़ा और मुस्लिम विरोधी है और आरक्षण खत्म करने की साजिश रच रही है.

‘बीजेपी देश को मनुस्मृति से चलाना चाहती है’

सावित्री बाई फुले बीजेपी की नीतियों से लगातार नाराज रही हैं. हाल में उन्होंने कई पार्टी विरोधी बयान दिए हैं. हाल में हनुमान को योगी आदित्यनाथ की ओर से दलित बताए जाने पर उन्होंने कहा कि मनुवादियों ने हनुमान जी को दलित बना दिया है.

सावित्री बाई फुले ने बहराइच के बलहा से पहली बार 2012 में विधानसभा चुनाव जीता था. इसके बाद वह 2014 में बहराइच से लोकसभा चुनाव में खड़ी हुईं और जीत गईं.

The quint report

हाथ से मैला साफ करने वालों के लिए मैं वोट करूंगा’ लोकेश बग

अभी हाल ही में भुवनेश्वर में कैपिटल हॉस्पिटल के आसपास के इलाके में घुमते हुए मुझे एक मैनुअल स्क्वेंजर से मिला. 25 साल के उस युवा के भी सपने थे. लेकिन गरीबी और निचली जाति से ताल्लुक रखने की वजह से मजबूरन उसे यह काम करना पड़ रहा था. उसने बताया कि उसकी पत्नी एक स्कूल में बतौर लाइब्रेरियन काम करती हैं, जहां उसे 8000 रुपये महीने सैलरी मिलती है. एक बेटी भी है, लेकिन पैसे के अभाव में उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

(फोटो: लोकेश बग)

मैंने उसे काफी जोर दिया, लेकिन उस युवा ने अपना नाम नहीं जाहिर करने को बोला. नाम जाहिर करने पर उसे नौकरी खोने का डर था. इस युवा की तरह हमारे इलाके में और इस देश में काफी लोग हैं, जिन्हें ये घिनौना काम करना पड़ रहा है. कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले तमाम सफाईकर्मी सुबह से मेनहोल, सीवर आदि की सफाई करते हैं. उसने मुझे बताया कि इस काम के लिए 5000 रुपये हर महीने उसे सैलरी मिलती है. लेकिन पिछले दो महीने से उसे सैलरी नहीं मिली है. जब मैंने सैलरी में देरी का कारण पूछा, तो उसने कहा-

हम कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर काम करते हैं. हम उनसे कुछ सवाल नहीं कर सकते. अगर हम कुछ भी पूछेंगे तो वे लोग हमें कभी भी नौकरी से निकाल सकते हैं.

मैनुअल स्क्वेंजर

इन लोगों के लिए काम के कोई घंटे भी तय नहीं होते. कॉन्ट्रैक्टर इन्हें कॉल करके कभी भी बुला लेता है. अपनी परेशानियों के बारे में ये किसी से खुलकर बात भी नहीं कर पाते हैं. जब मैंने काफी जोर डाला तो उसने अपनी परेशानियां हमसे शेयर की.

उसने बताया कि बगैर किसी सुरक्षा के उसे मेनहोल में जाना पड़ता है. अक्सर गंदगी आंख, कान और नाक और यहां तक कि मुंह के अंदर भी चला जाता है. जब भी वे मेनहोल या सीवर की सफाई के लिए अंदर जाते हैं, उन्हें लगता है कि ये उनका आखिरी दिन है. दिनभर गंदगी साफ करने के बाद शाम के समय शराब पीकर वो दिनभर की गंदगी और उससे जुड़ी यादों को मिटाने का काम करते हैं.

ना कोई मास्क दिया जाता है, ना ही कोई और सुरक्षा के उपाय किए जाते हैं. सुरक्षा के नाम पर केवल उनकी कमर से एक सेफ्टी बेल्ट बांधा रहता है. उस युवा ने बताया कि इस तरह का काम करने वाले तमाम लोग अपने प्रोफेशन को ‘’मौत का कुंआ’’ की तरह देखते हैं. जिसमें एक बार जाने के बाद कभी भी जिंदगी से हाथ धोना पड़ जाए. मेनहोल के अंदर कई तरह के हानिकारक गैस होते हैं, जिस वजह से घुटन से कई बार सफाईकर्मियों की मौत तक हो जाती है.

(फोटो: लोकेश बग)

उस युवा ने बताया कि मेनहोल से गंदगी निकालने के लिए कई तरह की मशीनें भी हैं, लेकिन लोग एक जाति विशेष के लोगों को ही इस काम के लिए बुलाते हैं.

लोगों के लिए हम कीड़े-मकोड़े की तरह हैं. जिसे वो या तो अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं या जब चाहे कुचल देते हैं.
(फोटो: लोकेश बग)

मैनुअल स्क्वेंजर

जब मैंने उससे पूछा कि क्या आपको मैनुअल स्क्वेंजर्स के लिए पुनर्वास कानून के बारे में पता है, तो उसने इससे इनकार किया. भारत में बगैर सुरक्षा उपायों के मैनुअल स्क्वेंजिंग पर रोक लगा हुआ है. बावजूद इसके यह लगातार जारी है. सरकार इन लोगों की सुरक्षा की तरफ खास ध्यान नहीं दे रही है. यह काफी चौंकाने वाली बात है कि सफाई के दौरान मैनुअल स्क्वेंजर्स की मौत होने पर उसके परिवारवालों को सरकार की तरफ से सहायता राशि दी जाती है, लेकिन उनके जीते-जी उनके सुरक्षा के लिए कोई उपाय नहीं किए जाते.

(फोटो: लोकेश बग)

सरकार के तमाम दावों के बावजूद मैनुअल स्क्वेंजर्स की संख्या में कमी नहीं आ रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 53,236 लोग मैनुअल स्क्वेंजिंग का काम कर रहे हैं. केंद्र और राज्य स्तर पर सरकार और सरकारी अधिकारियों को व्यवहारिक रूप से जागरूकता फैलाना चाहिए साथ ही इस दिशा में काम करने की जरूरत है.

देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस चुनाव में मैं उसी नेता को वोट देना पसंद करूंगा तो मैनुअल स्क्वेंजिंग को खत्म करने के लिए भरोसा देगा साथ ही इस काम में शामिल लोगों के पुनर्वास के उपाय सुनिश्चित करेगा.

बीजेपी के सहयोगी दल उसे शक की निगाह से क्यो देखते हैं

बीजेपी का अपने सहयोगी दलों के साथ व्यवहार कैसा है? पुरानी बीजेपी गठबंधन का धर्म निभाने का दावा करती थी. वैसा दिखता भी था, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नई बीजेपी में ‘टर्म ऑफ इंगेजमेंट’ की कसौटी अलग है. साथी दल बीजेपी के विस्तार के काम आने वाले औजार हैं. आहुति का सामान हैं. उससे ज्यादा कुछ नहीं. रिश्ता एकतरफा है.

एक कसौटी है कि अपने को बराबरी का पार्टनर मत समझिए. इसके उदाहरण हैं चंद्रबाबू नायडू. नायडू को उम्मीद थी कि बीजेपी उन्हें अहमियत देगी, नियमित सलाह-मशविरा करेगी. आंध्र के लिए जब उन्होंने पैकेज मांगा और एसर्ट करने की कोशिश की, तो बीजेपी ने उनसे बेरुखी दिखाना शुरू कर दिया. नायडू ने ये समझने में देर कर दी और आखिरकार उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा.

शिवसेना को भी यही भ्रम था कि उसे पहले की तरह बीजेपी सीनियर पार्टनर नहीं, तो कम से कम बराबरी का पार्टनर तो माने. लेकिन नई बीजेपी को ये लगता था कि उसे चप्पा-चप्पा जीतना है. भले ही जिसके सहारे जीते, उसे बाद में तोड़ना या छोड़ना पड़े.

इस मामले में कोई मुरव्वत नहीं होगी. शिवसेना ने भी खूब पैर पटके, बागी अंदाज दिखाया. बीजेपी नहीं पिघली, लेकिन बीजेपी को ये अहसास है कि बिना शिवसेना के वो महाराष्ट्र नहीं बचा सकती. उसके पक्ष में 2014 वाला माहौल नहीं है.

कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त दिख रहा है, इसलिए नायडू को खोने के बाद शिवसेना को खोने का रिस्क बीजेपी नहीं उठा सकती. हाल के दिनों में ये सिग्नल मिल गए हैं कि बीजेपी इस पार्टरशिप को बचाने में लगी हुई है. लेकिन ये मानना गलत होगा कि उद्धव ठाकरे मनमुटाव भूलकर बीजेपी पर भरोसा करने लगेंगे.

कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त है
कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त है
(फोटो: PTI)

उद्धव का टारगेट साफ है. लोकसभा चुनाव में दो सीट कम-ज्यादा पर वो मान भी जाएं, लेकिन विधानसभा चुनाव में शर्त होगी कि मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा. डीलमेकर या ब्रेकर ये है. उद्धव नई बीजेपी के साथ लगातार पंजा लड़ा रहे हैं, जो जाहिर है कि बीजेपी को पसंद नहीं आ रहा.

महबूबा मुफ्ती के साथ तो बेहद अजीब सलूक हुआ. जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने पीडीपी के साथ एक बेमेल गठजोड़ किया था. लेकिन इस राज्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उसके पास कोई ईमानदार प्लान नहीं था. बीजेपी के लिए कश्मीर एक स्थायी पंचिंग बैग है.

आम चुनाव के पहले बीजेपी के लिए ये जरूरी हो गया कि वो इस गठजोड़ से बाहर हो जाए. हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का बीजेपी का जो मूल आधार है, उस पर वो अपने कोर वोटर से क्या कहती. इसीलिए कश्मीर के हालात कितने भी क्यों न बिगड़ जाएं, राजधर्म का शीर्षासन क्यों न हो जाए, 2019 चुनावों के बाद राज करते रहने के लिए महबूबा सरकार की कुर्बानी फायदे का सौदा लगा, तो कुर्बानी हो गई.

बड़ी पार्टियों में अकाली दल ही एक ऐसा सहयोगी है, जिससे बात बिगड़ी नहीं है, लेकिन इस रिश्ते में जोश भी नहीं है. सबूत है अगस्त महीने में अकाली नेता नरेश गुजराल का ये बयान कि बीजेपी को अपने सहयोगी दलों के साथ उचित व्यवहार करना चाहिए और उनके इलाकों में घुसपैठ नहीं करनी चाहिए.

बीजेपी का शुरू से ही इरादा था कि वो बड़ी सहयोगी पार्टियों को कम तवज्जो देगी और उनकी जगह छोटी-छोटी पार्टियों का स्टॉक इकट्ठा कर लेगी. उन्हें मैनेज करना आसान होगा. लेकिन ये भी नहीं हुआ.

बिहार के उपेन्द्र कुशवाहा और उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर बीजेपी से अपनी नाराजगी लगातार जाहिर कर रहे हैं. कुशवाहा 2019 के चुनाव में एनडीए के साथ रहेंगे या नहीं, अभी कहना मुश्किल है. कहने को एनडीए में 40 से ज्‍यादा पार्टियां हैं, लेकिन अकेले बीजेपी के पास बहुमत होने के कारण ये पार्टियां मार्जिन पर पड़ी सजावट का समान ही हैं.

तमिलनाडु में बीजेपी संघ के लॉन्ग टर्म प्लान पर काम कर रही है. एआईएडीएमके के साथ एक कामचलाऊ रिश्ता है. द्रविड़ पार्टियों के वर्चस्व को तोड़ने का प्लान है. बीजेपी का हथियार वहां रजनीकांत हैं.

बीजेपी का इरादा अभी के लिए ये है कि किसी द्रविड़ पार्टी को 25-30 सीटें मिलने का पुराना सिलसिला टूट जाए, तो वो छोटे दलों से बारगेन करने में मजबूत हालात में रहेगी.
तेलंगाना में आगे के लिए केसीआर पर बीजेपी की नजर है. लेकिन कुछ कद्दावर नेता ऐसे हैं, जिनसे नई बीजेपी शुरू से ही दूर रहने का फैसला कर चुकी थी. वाजपेयी के गठजोड़ में में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और फारूक अब्दुल्ला शामिल थे, लेकिन अब वो सब बेगाने हैं.

इकलौता नया रिश्ता बना बिहार में नीतीश कुमार से. ये एक पहेली है. दोनों के बीच गर्मजोशी कम और एक-दूसरे से सावधानी ज्‍यादा नजर आती है. ये हुई सहयोगी दलों की बात. एक नजर डालिए उन नेताओं पर, जो बीजेपी में थे या शामिल हुए, उनका क्या हाल हुआ.

ताजा मिसाल महाराष्ट्र के नारायण राणे हैं, जो कई पार्टियों से घूमते-घामते बीजेपी में पहुंच तो गए, लेकिन उन्हें कोई पद नहीं मिला. अब निराश हैं. शरद पवार उनसे बात कर रहे हैं. उड़ीसा में बीजेडी के दो बड़े प्रादेशिक नेता दिलीप रे और विजय महापात्रा ने बीजेपी में कुछ वक्‍त गुजारने के बाद हाल ही में पार्टी छोड़ दी है.

बीजेपी से निराश हैं नारायण राणे
बीजेपी से निराश हैं नारायण राणे
(फोटोः IANS)

राष्ट्रीय स्तर पर ये बड़े नाम नहीं, लेकिन राज्य में ये पहली कतार वाले नाम हैं. एक बदलाव ये आया है कि बीजेपी में शामिल होने का वन-वे ट्रैफिक बंद हुआ है. अब उलटा भी हो रहा है. अभी विधानसभा चुनाव में राजस्थान और मध्य प्रदेश में कई मंझले स्तर के नेता कांग्रेस में शामिल हुए हैं. जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह इसके एक ताजा उदाहरण हैं. नवजोत सिंह सिद्धू और उनके पहले कीर्ति आजाद का किस्सा तो याद है ही.

एक तबका और है. वो है यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे पुराने बीजेपी नेताओं का, जिनको नया नेतृत्व नहीं पचा पाया. तर्क दिया जा सकता है कि आरके सिंह, हारदीप पुरी और सत्यपाल सिंह जैसे कई नए चेहरे हैं, जो बीजेपी में आए और पहले ही राउंड में मंत्री बन गए. इसमें एक फर्क है. ये ज्‍यादातर लोग टेक्नोक्रेट हैं, राजनीतिक नहीं.

समस्या राजनीतिक लोगों से है. दो तरह के राजनीतिक लोग- एक वो, जिनके पास वोट हैं, अपना जनाधार है. दूसरे वैसे राजनीतिक लोग, जो आपसे तर्क कर सकते हैं और मतांतर रख सकते हैं. नई बीजेपी इनको नहीं पचा पाती.

गठबंधन का धर्म हो या मतभेद रखने वाले नेता के साथ निर्वाह, इन दोनों चीजों को साधने के लिए लोकतांत्रिक मन की जरूरत होती है. वो शॉर्ट सप्लाई में है.

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स्टैचू ऑफ यूनिटी जितना पैसे से स्टैचू ऑफ़ यूनिटी बना उतने रुपए मै गुजरात का हर किसान खुशी से झूम उठता अगर ये पैसा किसानों के हित के लिए खर्च होता

स्टेच्यू ऑफ यूनिटी:इतने खर्चे में लहलहा उठती गुजरात की प्यासी धरती

गुजरात में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के तौर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति लगाने पर 2,989 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इतनी बड़ी रकम से देश में आईआईटी के दो कैंपस, पांच आईआईएम कैंपस और मंगल अभियान के लिए इसरो के छह मिशन शुरू हो सकते थे.

यह राशि गुजरात सरकार की ओर से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत अपनी योजनाओं को शामिल कराने के लिए भेजे प्रस्ताव की राशि से दोगुनी है. पटेल की मूर्ति बनाने में जितना खर्च हुआ उससे 40,192 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती थी. साथ ही 162 लघु सिंचाई योजनाओं की रिपेयरिंग, रिनोवेशन और रिस्टोरेशन हो सकता है. साथ ही 425 छोटे चैक डैम का निर्माण किया जा सकता है.

देखें वीडियो : हिंदुत्व की ‘बंदूक’ से सरदार पटेल की हाईजैकिंग ना हो पाएगी

गुजरात के किसान-आदिवासियों में मूर्ति को लेकर नाराजगी

गुजरत में किसानों और आदिवासियों के बीच सरदार पटेल की इस मूर्ति को लेकर नाराजगी है. इस प्रोजेक्ट पर की गई शाहखर्ची को लेकर उनके मन में गुस्सा है. ये मूर्ति जहां स्थापित की गई है उस इलाके के जल ग्रहण क्षेत्र में किसानों को पानी की समस्या की चिंता सता रही है. साथ ही वे मूर्ति की वजह से विस्थापित हुए लोगों के ठीक से पुनर्वास न होने से भी नाराज हैं.

मूर्ति निर्माण की वजह से गुजरात के नर्मदा जिले के 72 गांवों के 75 हजार आदिवासी प्रभावित हुए हैं. इन 72 गांवों में 32 काफी अधिक प्रभावित हैं. 19 गांवों में लोगों को मुआवजा तो मिल गया लेकिन उनका पुनर्वनास नहीं हुआ है. तेरह गांवों में वादे के मुताबिक लोगों को नौकरी और जमीन नहीं दी गई. छोटा उदेपुर, पंचमहल, बड़ोदरा और नर्मदा जिलों के 1500 किसानों के बीच इसे लेकर नाराजगी है.

मिंट की एक खबर में पॉलिटिकल एक्सपर्ट घनश्याम शाह के हवाले से कहा गया है कि जब राज्य में नर्मदा डैम में पानी कम होने से जल संकट है तो ऐसे वक्त में मूर्ति स्थापित करने का काम एक साल के लिए टाला जा सकता था.

इनपुट : इंडिया स्पेंड

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ब्राह्मण को लुभाने की राजनीति क्या है

ब्राह्मण बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है. 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में ब्राह्मणों की संख्या 5.52 परसेंट थी. इसमें वे तमाम जातियां भी थीं, जिन्हें ब्राह्मण अपनी बिरादरी का नहीं मानते लेकिन जो खुद को ब्राह्मण मानती हैं. तब जिन जातियों ने खुद को ब्राहमण लिखवाया था, उनमें से कई जैसे जांगिड़ और गोस्वामी अब ओबीसी में हैं. त्यागी और भूमिहार अलग जाति की तरह व्यवहार करते हैं और ब्राह्मणों के साथ उनका विवाह संबंध नहीं चलता. जनगणना के नियमों के मुताबिक, जिन्होंने भी खुद को ब्राह्मण बताया, वे सभी इस 5.52 परसेंट के आंकड़े में शामिल है.

आज देश में ब्राह्मणों की कितनी संख्या है, इसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है. 1931 के बाद जाति जनगणना के आंकड़े नहीं आए हैं. ये मानकर चल सकते हैं कि ब्राह्मणों का शहरीकरण ज्यादा हुआ तो उनमें शिशु जन्म दर कम होगी और उनकी संख्या का अनुपात पहले से ज्यादा तो नहीं ही हुआ होगा. हालांकि ये भी एक अनुमान ही है. ब्राह्मणों में विदेश जाकर बस जाने वालों की संख्या भी अच्छी-खासी है.

राजस्थान में पूजा करते राहुल गांधी
राजस्थान में पूजा करते राहुल गांधी

एक अंदाजा ये भी लगाया जा सकता है कि चूंकि भारत में पढ़े-लिखे लोग वोट कम डालते हैं, इसलिए ब्राह्मणों में वास्तविक मतदाताओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम होगी.

तो इतने से वोट के लिए राहुल गांधी बनियान उतारकर और जनेऊ दिखाकर क्यों घूम रहे हैं?

राहुल गांधी जब खुद को ब्राह्मण दिखाने की कोशिश कर रहे हैं तो उनके सामने ब्राह्मण वोटों का आंकड़ा नहीं है. सिर्फ संख्या की बात है तो 52 फीसदी से ज्यादा ओबीसी, 16.6 फीसदी दलित, 14.2 फीसदी मुसलमानों या 8.6 फीसदी आदिवासियों के मुकाबले ब्राह्मण काफी कम हैं.

मराठा, जाट, पटेल, यादव, कम्मा, रेड्डी, नायर, नाडार, वन्नियार, कुर्मी, मल्लाह जैसी कई जातियां खास इलाकों में ज्यादा बड़ी संख्या में हैं और मतदान के नतीजों को प्रभावित करने की बेहतर स्थिति में हैं. इसके बावजूद, राहुल गांधी ने अपनी ब्राह्मण पहचान को साबित करने के लिए जान लड़ी दी है.

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ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश सिर्फ कांग्रेस नहीं कर रही है. बीजेपी जब केंद्र में अपनी सरकार बनाती है तो कैबिनेट में ठीक एक तिहाई मंत्री सिर्फ ब्राह्मण बनाती है. वित्त, विदेश, रक्षा, मानव संसाधान, स्वास्थ्य, सड़क और जल परिवहन जैसे महत्वपूर्ण विभाग ब्राह्मण मंत्रियों को दिए जाते हैं. बीजेपी पार्टी को चला रहा आरएसएस, एक अपवाद (राजेंद्र सिंह) को छोड़कर हमेशा अपना मुखिया किसी न किसी ब्राह्मण को ही बनाता है. बीजेपी ने केंद्रीय ब्यूरोक्रेसी में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से लेकर कैबिनेट सेक्रेटरी और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव सभी एक ही जाति के बनाए हैं.

सवाल उठता है कि कि इतनी कम संख्या होते हुए भी ब्राह्मण राजनीति में इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं?

(फोटो: ट्विटर)

मीडिया की टु स्टेप थ्योरी और ओपिनियन लीडर्स जैसे कम्युनिकेशन के एक लोकप्रिय सिद्धांत के जरिए आसानी से समझा जा सकता है कि कम संख्या के बावजूद ब्राह्मण राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं. इस सिद्धांत का नाम टु स्टेप या मल्टी स्टेप थ्योरी है. इस थ्योरी के मुताबिक कोई भी संदेश या संवाद स्रोत जैसे टीवी, रेडियो या अखबार से सीधे सुनने वाले तक असरदार तरीके से नहीं पहुंचता.

इस संदेश को पहले समाज के प्रभावशाली लोग, जिन्हें ओपिनियन लीडर्स कहा जाता है, वे पकड़ते हैं, उस पर अपनी राय बनाते हैं, उसमें अपने विचार जोड़ते-घटाते हैं और वे जब इसे नीचे तक ले जाते हैं, तब जाकर वह संवाद असर पैदा करता है.जिन लोगों का समाज में आदर और असर होता है, उनकी बात सुन कर बाकी लोग अपनी राय बनाते हैं.

इस थ्योरी को सबसे पहले 1944 में प्रकाशित किया गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ये पाया गया कि आम जनता सीधे रेडियो या समाचार पत्र से सूचनाएं लेकर अपनी राय कम बनाती है. उनकी राय बनाने में उन लोगों यानी ओपिनियन लीडर्स का ज्यादा योगदान होता है, जो रेडियो या अखबारों की सूचनाओं को अपने ढंग से समझते हैं और उसमें अपनी राय जोड़कर बाकी लोगों तक पहुंचाते हैं.

जर्मन दार्शनिक जरगन हैबरमास अपनी पब्लिक स्फियर की थ्योरी में विमर्श की उन जगहों को लोकतंत्र में जरूरी मानते हैं, जहां लोग आपस में चर्चा करके सार्वजनिक मुद्दों पर राय बनाते हैं और किसी निष्कर्ष पर पहुंचते है. पब्लिक स्फियर में ओपिनियन लीडर्स मत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

ब्राह्मण हैं भारत के ओपिनियन लीडर्स

शिक्षा तक सबसे पहले पहुंच होने की वजह से ब्राह्मणों की लोक संवाद के क्षेत्र में अच्छी दखल है. कई पीढ़ियों से पढ़ने-लिखने के कारण उनका एक खास तरह का सामाजिक स्तर बन गया है, जिसकी वजह से आदर के पात्र हैं और उनका असर समाज पर है. वे महत्वपूर्ण पदों पर भी हैं. खासकर शिक्षक बनने के क्षेत्र में उनका पारंपरिक दखल रहा है, क्योंकि परंपरागत रूप से पढ़ाने का पेशा ब्राहमणों के पास रहा है.

गांव-कस्बों में शिक्षक की काफी इज्जत होती है और उनकी बात सुनी जाती है. देश दुनिया में क्या चल रहा है, इसे डिकोड करके अक्सर शिक्षक ही आम लोगों तक पहुंचाता है. इसके अलावा भारतीय खासकर हिंदू समाज व्यवस्था में ब्राह्मण शिखर पर हैं औऱ इस वजह से आदर के पात्र हैं. यहीं नहीं, ब्राह्मण एक आम हिंदू और भगवान के बीच मध्यस्थ भी होता है. इस वजह से भी उसकी बात महत्वपूर्ण होती है.

(फोटो: prokerala.com)

लोक विमर्श में और जनता की राय बनाने में ब्राह्मण इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसकी बहुत ज्यादा संख्या है. उसकी ताकत ये है कि वह समाज का ओपिनियन लीडर है. लोग उनकी बातों को गौर से सुनते हैं. वह समाज में आदर का पात्र है. चूंकि बच्चों का नाम रखने से लेकर, शादी करने, और बच्चा पैदा होने से लेकर आदमी के मरने तक में वह मार्गदर्शक है, तो स्वभाव वश लोग राजनीतिक-सामाजिक मामलों में भी उनकी राय मान लेते हैं.

इसके अलावा मीडिया और जनसंचार के साधनों पर भी ब्राह्मणों की अच्छी खासी संख्या है. योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र यादव ने 2006 में दिल्ली मे मीडिया संस्थानों के फैसला लेने वाले पदों का सर्वे करके बताया था कि इन पदों पर ब्राह्मणों की संख्या 49% है.

लोकतंत्र में लोगों की राय बनाने में मीडिया की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता. एजेंडा सेट करने में मीडिया की भूमिका पर दुनिया भर में कई रिसर्च हो चुके हैं. भारतीय मीडिया में मौजूद ब्राह्मण जिस राजनीतिक दल या नेता के पक्ष में खड़े हो जाएं (हालांकि यह पूरी तरह कभी नहीं होता), उस दल या नेता के पक्ष में जनमत के झुकने की संभावना ज्यादा होती है.

तो राहुल गांधी जब खुद को ब्राह्मण बता रहे हैं, तो उनकी नजर ब्राह्मण वोट से ज्यादा इन ओपिनियन लीडर्स पर है.

चंदा लेकर चुनाव सुनने में बड़ा अजीब लगता है क्या लगता है सिर्फ चंदा से ये लोग चुनाव लड़ते हैं

अगर एक स्कूल प्रिंसिपल का बेटा अपनी क्लास में भारी अंतर से टॉप करे तो उसकी दो वजह हो सकती हैं. पहली ये कि वो बेहद प्रतिभाशाली है और दूसरी ये कि टीचर इस बात से डरते हैं कि बेटे को ज्यादा नंबर ना दिए तो प्रींसिपल साहब नाराज हो जाएंगे.

ये बात मेरे दिमाग में इलेक्टोरल बॉन्ड के ताजा आंकड़ों को देखने के बाद आई. ये आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2018 में जारी किए गए 222 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड में ये 210 करोड़ रुपये चुनावी चंदे के तौर पर बीजेपी के खाते में आए. यानी कुल रकम का 95 परसेंट.

कथा जोर गरम है….

चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए लॉन्च किए गए इलेक्टोरल बॉन्ड का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को हुआ तो क्या ये महज इत्तेफाक है या फिर इसमें कोई पेंच है? अब वो पेंच क्या हो सकता है ये समझने से पहले मैं जरा आपको इलेक्टोरल बॉन्ड की फिलोसफी समझाता हूं.

1 फरवरी 2017 को दिए अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की कि अब पॉलिटिकल पार्टियों को चंदा कैश में नहीं इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिलेगा. कौन कितने रुपये का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदकर किस पार्टी को दे रहा है इसकी जानकारी किसी को नहीं होगी. मतलब ये कि आपने अगर इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे तो वो चंदे की शक्ल में बीजेपी को गए या कांग्रेस को, मायावती की पार्टी को मिले या ममता बनर्जी को, ये बात खुद आपके अलावा किसी को पता नहीं होगा.

माना जाता है कि चुनाव में जिस पार्टी के जीतने की संभावना होती है लोग उस पार्टी को खुलकर चंदा देते हैं ताकि सरकार बनने के बाद उससे फायदा लिया जा सके.

और सरकार में होने वाले सारे भ्रष्टाचार की जड़ यही है.

क्विंट की स्पेशल इनवेस्टिगेशन

तो जनाब, बीजेपी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई यानी जब पार्टी को ये पता ही नहीं होगी कि चंदा किसने दिया तो वो फायदा किसे पहुंचाएगी. अब सुनने में तो इंतजाम बढ़िया है लेकिन क्विंट रिपोर्टर पूनम अग्रवाल ने स्पेशल इंवेस्टीगेशन से आपको बताया कि इंतजाम इतना भी बढ़िया नहीं है.

पूनम ने 1-1 हजार रुपये के दो इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे. बॉन्ड में कोई छुपा हुआ फीचर या नंबर है या नहीं, ये जानने के लिए उन्हें देश की एक नामी लैब में फॉरेंसिक टेस्ट के लिए भेजा गया. और रिजल्ट ये आया कि इलेक्टोरल बॉन्ड में अल्फा न्युमेरिक नंबर्स हैं जो नंगी आंख से तो नहीं दिखते लेकिन अल्ट्रा वायलेट लाइट में टेस्ट करने पर ओरिजिनल डॉक्यूमेंट के दाहिने ऊपरी कोने में एक छिपा हुआ सीरियल नंबर दिखता है

ये भी देखिए : इलेक्टोरल बॉन्ड पर वित्त मंत्रालय के जवाबों पर हमारे कुछ सवाल हैं

हाथ कंगन को आरसी क्या?

यानी पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ का राग भले ही अलापा जा रहा हो लेकिन असल में बैंक के जरिए सरकार के पास इस ‘अल्फा-न्युमेरिक नंबर’ के जरिए पूरा ब्योरा होगा.

किस बैंक अकाउंट से कितने के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए और वो किस पार्टी को चंदे के तौर पर दिए गए. ये खबर आपको न्यूज चैनलों और अखबारोंं ने ना तब दिखाई थी और ना अब दिखाएगा.

लेकिन साहब, हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या? आंकड़े कुछ बोल रहे हैं और वो ये कि 1 मार्च 2018 से 10 मार्च 2018 के बीच लॉन्च किए गए इलेक्टोरल बॉन्ड की 95 परसेंट रकम बीजेपी को चंदे के तौर पर मिली

अब हो सकता है कि बॉन्ड खरीदने वाले लोगों की पहली पसंद ही बीजेपी हो लेकिन मैं ये फैसला आप पर छोड़ता हूं. आप खुद तय कीजिए कि क्लास में टॉप करने वाला स्टूडेंट असाधारण तौर पर प्रतिभाशाली है या फिर ज्यादा नंबर इसलिए मिले हैं कि कहीं ‘प्रिंसिपल साहब’ नाराज ना हो जाएं.

200 cops shifted out of Patna distric

200 cops shifted out of Patna district

PATNA: Patna zonal IG Nayyar Hasnain Khan has transferred 200 officers out of

Patna district

as they had completed their term of eight years in a police range. They were in fact among the 839 officers reshuffled in the

Patna police

zone on Tuesday.

According to the IG, the reshuffled officers include 11 inspectors, 656 SIs and 172 ASIs. Asked if the transfers were ordered in the backdrop of the violence at the New Police Lines at Lodipur in Patna on November 2, Khan said it was a routine process.

“There were prior instructions from CM Nitish Kumar and the state police HQ to transfer officers posted at a place for long,” the IG said.

“From Patna, one inspector, 176 SIs and 23 ASIs were transferred out of the central range consisting of Patna and

Nalanda

districts,” Khan said and added a police officer of these ranks could remain posted for a tenure of six years in a district, eight years in a range and ten years in a zone.

Patna is the state’s largest police zone which consists of 11 districts. The IGs of

Muzaffarpur

, Bhagalpur and

Darbhanga

zones are likely to take similar steps soon.

The quint

कहते हैं कि राजनीति में हफ्ते भर का वक्त भी लंबा होता है. लेकिन पिछले हफ्ते की घटनाओं ने दिखाया कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश की सियासत में जो नाटकीय बदलाव हुआ है, उसे साबित करने के लिए भी इतना समय काफी है.

सिर्फ सात दिनों में लोकतंत्र के चारों स्तंभ – कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया – को नए सिरे से परिभाषित किया गया.

2014 तक देश में मध्यमार्गीय राजनीति पर सबकी सहमति थी. ये पिछले चुनाव में बीजेपी की जीत से खत्म हो गई. आज इसमें कोई शक नहीं रह गया है क्योंकि बीजेपी सरकार के साढ़े चार साल का रिकॉर्ड हमारे सामने है.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने से पहले माना जाता था कि भारत का झुकाव लेफ्ट या राइट की तरफ हो सकता है, लेकिन ये रहेगा मध्यमार्गीय दायरे के अंदर. यहां उदारवादी विचारधारा ही चलेगी.

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजकाज के 6 साल में ये सोच और मजबूत हुई. उस सरकार का झुकाव राइट की तरफ था, लेकिन आजादी के 50 सालों में देश में जो लोकतांत्रिक संस्थान खड़े हुए थे, उन पर तब आंच नहीं आई थी.

ये भी देखें- VIDEO | ‘मोदीराज’ बीते 25 सालों की सबसे दखलअंदाजी पसंद सरकार है

मोदी सरकार ने बगैर किसी झिझक के उस मध्यमार्गीय रास्ते को बंद कर दिया. मैं तथ्यों के आधार पर ये बात कह रहा हूं. जजमेंट पास नहीं कर रहा. जो जनादेश मिला, उससे मोदी सरकार ने बहुसंख्यकवाद की इमारत खड़ी की. 2014 के बाद सरकार का दखल बढ़ा, कई फ्री मार्केट इंस्टीट्यूशंस का राष्ट्रीयकरण किया गया. इनमें दवा की कीमतों से लेकर स्पोर्ट्स राइट्स और तेल जैसी चीजें शामिल हैं.

ये सरकार खुलकर हिंदू हितों की बात करती है. अल्पसंख्यकों को आहत करना और उनके साथ अलग तरह के सलूक को वो सम्मान की बात समझती है. वो कट्टर सैन्य राष्ट्रवाद की वकालत करती है, जिस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा हुआ है. यहां पार्टी कभी सरकार बन जाती है तो कभी वो खुद को राष्ट्र समझने लगती है.

इसलिए अगर आप बीजेपी या इस सरकार के खिलाफ हैं तो आपको ‘राष्ट्रद्रोही’ घोषित कर दिया जाता है. उदारवादी सोच का ये मजाक बनाती है. वैचारिक विरोधी उसके लिए ऐसे ‘शत्रु’ हैं, जिनका नामोनिशान मिटा देना चाहिए. वो इन पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाती है, गद्दार कहती है. वो नहीं मानती कि राजनीतिक विरोधियों का नामोनिशान बौद्धिक विमर्श से मिटाना चाहिए. वो ऐसे संस्थानों को खत्म करना चाहती है, जिन्हें नरम और लचीला माना जाता है.

आइए देखते हैं कि किस तरह से तीन घटनाओं से ये बात साबित हुई है. कैसे हफ्ते भर का समय जो पलक झपकते ही गुजर जाता है, उसमें लोकतांत्रिक परंपराओं को बदला गया है.

J&K विधानसभा को बेशर्मी से भंग किया गया

2015 में मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर अपने सख्त रुख को बदलते हुए एक साहसिक राजनीतिक कदम उठाया था. उसने ‘नरम अलगाववादी’ माने जाने वाली मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी के साथ राज्य में गठबंधन सरकार बनाई थी. लोगों ने तब तालियां बजाई थीं. उन्हें लगा कि मोदी शांति की पहल कर रहे हैं.

वह उम्मीद और पुराने शिकवे दूर करने का वक्त था, लेकिन ये उम्मीद बहुत जल्द टूट गई. तल्खियों के बोझ से अलायंस टूट गया और मोदी जम्मू-कश्मीर पर सैन्यवाद की नीति पर लौट गए.

उत्तर भारतीय नेता और एक पार्टी समर्थक को राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया गया. इसके बाद पीडीपी को तोड़कर बीजेपी ने सरकार बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी. इस खतरे को भांपते हुए मोदी के तीनों विरोधी- पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस – ने आपसी मतभेद भुलाकर 90 सदस्यों वाली विधानसभा में 50 से अधिक विधायकों का मजबूत बहुमत जुटाया.

लोकतांत्रिक परंपरा के मुताबिक उन्हें सरकार बनाने का न्योता मिलना चाहिए था, लेकिन राज्यपाल ने अजीब काम किया. उन्होंने अपनी फैक्स मशीन बंद कर दी और फैसला लेने के लिए 8 घंटे तक इंतजार किया, जब तक कि दिल्ली के हुक्मरानों से उनकी बातचीत नहीं हो गई. उन्हें विधानसभा भंग करने की हिदायत मिली. गवर्नर साहब ने फौरन उस पर अमल किया. इस तरह से विधायिका की परंपरा जूतों तले रौंदी गई.

मैं मानता हूं कि संविधान को ताक पर रखकर ऐसी हरकत करने वाले वह पहले गवर्नर नहीं हैं, लेकिन ये मामला जम्मू-कश्मीर का था. ये अशांत क्षेत्र है, लोग अलग-थलग पड़े हुए हैं (याद करिए कि कुछ ही दिनों पहले 95% जनता ने स्थानीय चुनाव का बहिष्कार किया था). खैर, राइट विंग विचारधारा के दबाव के चलते कार्यपालिका/विधायिका में विस्फोट हुआ और एक नाजुक सर्वसम्मति उसमें तबाह हो गई.

RBI गवर्नर को बोर्ड ने जंजीरों में जकड़ा

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की स्वायत्तता पर किसी को संदेह नहीं था, लेकिन मोदी सरकार उस पर राजनीतिक प्रभुत्व चाहती थी. नोटबंदी, जीएसटी और सुस्त इकोनॉमिक ग्रोथ ने छोटे कारोबारियों को जो नुकसान पहुंचाया है, वह उसे कम करने के लिए आरबीआई पर दबाव डाल रही थी. वह चाहती थी कि दर्जन भर सरकारी बैंक फिर से कर्ज बांटना शुरू कर दें, लेकिन इसके लिए उसे इन बैंकों में बड़ा निवेश करना पड़ता. आदर्श स्थिति में इसके लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल होना चाहिए था, लेकिन इससे बजट अनुमान बिगड़ जाते.

इसलिए उसने आरबीआई एक्ट के सेक्शन 7 का इस्तेमाल की धमकी दी, ताकि रिजर्व बैंक उसका कहा मानने के लिए मजबूर हो जाए. केंद्रीय बैंक के दमन के लिए इसका कभी इस्तेमाल नहीं हुआ था.

इतना ही नहीं, आरबीआई को झुकाने के लिए सरकार ने बोर्ड के लिए खास नॉमिनी चुने. आरबीआई गवर्नर को कुछ मांगें माननी पड़ीं, जबकि दूसरी मांगों पर सरकार ने कुछ हफ्तों तक चुप्पी साध ली है.

दिसंबर के मध्य में आरबीआई बोर्ड की मीटिंग है, जिसमें फिर से इनके लिए दबाव बनाया जाएगा. ये ऐसा युद्धविराम है, जो कभी भी खत्म हो सकता है. वैसे पहली बाजी सरकार ने जीत ली है, लेकिन इस मामले से गवर्नर और आरबीआई बोर्ड के रिश्ते शायद हमेशा के लिए बदल गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और ‘शोर’ मचाने वाले पत्रकार

सीबीआई में जो तमाशा चल रहा है, उसके सामने तो रोमांचक जासूसी कहानियां लिखने वाले भी हल्के पड़ जाएं. सरकार ने सीबीआई का नया चीफ बिठाने के लिए आधी रात को हथियारबंद लोगों को भेजा. सीबीआई में जिन बड़े अफसरों के बीच झगड़ा चल रहा था, उन्हें निकाला गया. उनके दफ्तरों पर छापे मारे गए, गैजेट्स और फाइलों की जासूसी की गई. अगले दिन निकाले गए अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में सरकार को चुनौती दी. उसके खिलाफ तमाम याचिकाएं दायर कीं. अफसरों ने एक दूसरे के खिलाफ भी सर्वोच्च अदालत में पिटीशन फाइल कीं. हालांकि, इनमें से एक अधिकारी का अदालत को दिया गया जवाब लीक हो गया, जिससे अदालत भड़क गई.

लेकिन क्या कोर्ट ने यहां एक पक्ष को दोषी मानकर न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया है? ये लीक बचाव पक्ष के वकील के कीबोर्ड ऑपरेटर या कोर्ट क्लर्क किसी के यहां से हो सकता था, लेकिन बेंच ने सीबीआई चीफ को कसूरवार माना.

जज इस मामले से विचलित हैं. ये सामान्य केस नहीं है. इसलिए उनकी हालत कुछ हद तक समझी जा सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि ‘शोर’ मचाने वाले पत्रकार लोकतंत्र की लाइफलाइन होते हैं. सीबीआई मामले में वे एक न्यूज पोर्टल को ‘जो बातें नहीं छपनी चाहिए थीं’, उसे पब्लिश करने से नाराज हो गए. इससे एक झटके में लोकतंत्र के तीसरे और चौथे स्तंभ का जोड़ टूट गया.

चुनावी मैदान में ही लड़ी जा सकती है राजनीतिक लड़ाई

वैसे मोदी सरकार ने इन मामलों में ‘लोकतांत्रिक’ अस्त्र का ही इस्तेमाल किया है, भले ही उसके तौर-तरीकों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं. इस सरकार ने 2014 में ऐतिहासिक जनादेश हासिल किया था.

प्रधानमंत्री मोदी उस जनादेश का इस्तेमाल देश में नया राजनीतिक लोकतंत्र गढ़ने के लिए कर रहे हैं. उसका जवाब देने के लिए विपक्ष को ऐसा एजेंडा पेश करना चाहिए, जो जनता को पसंद आए यानी विपक्ष को अपने हक में जनादेश हासिल करना होगा. मोदी विरोधियों का नैतिकता की दुहाई देने से काम नहीं चलेगा. उन्हें आक्रामक और ताकतवर राजनीतिक जवाब देना होगा.

ये भी देखें- मोदीजी सरदार पटेल का इतना सम्मान, फिर RBI वाले पटेल पर दबाव क्यों?

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DUKE IN 125CC

KTM ने 1.18 लाख रुपए में उतारी 125 Duke,मुकाबला होगा 150cc बाइक से

फर्राटा बाइक बनाने वाली KTM ने 125cc सेग्मेंट में 125 ड्यूक बाइक उतार दी है. 1.18 लाख रुपए कीमत वाली KTM की ये सबसे सस्ती बाइक होगी.

टेक्नोलॉजी के लिहाज से भी 125cc बाइक सेग्मेंट में ये सबसे ज्यादा एडवांस बाइक होगी.

(फोटो- KTM)

KTM 125 ड्यूक की खासियत

  • 125cc सेगमेंट की अकेली बाइक जिसमें अगले और पिछले दोनों व्हील में डिस्क ब्रेक और ABS
  • ज्यादातर खासियत 200cc बाइक की तरह
  • अलॉय व्हील, पीछे सिंगल सस्पेंशन
  • सुपर बाइक की तरह डायनामिक बॉडी

इंजन

  • 124.7 cc लिक्विड कूल्ड
  • सिंगल सिलेंडर
  • 6 स्पीड गियर
  • 14.5 bhp पावर

वजन- 148 किलो

KTM 125 ड्यूक भले ही सुपरबाइक की तरफ पावरफुल नहीं हो पर 125cc सेगमेंट में इससे ज्यादा स्पोर्टी और रफ्तार वाली बाइक नहीं है.

किससे होगा मुकाबला

सिर्फ सुजकी Gixxer 150 SF ही मुकाबला करने की स्थिति में है. वैसे 125cc सेगमेंट में इस बाइक को टक्कर देने वाली कोई दूसरी बाइक अभी नहीं है.

वैसे हीरो ग्लेमर, होंडा CB शाइन और बजाज V12 भी 125cc सेगमेंट में लंबे वक्त से हैं. लेकिन KTM के आने के बाद इनके लिए मुकाबला बहुत मुश्किल हो जाएगा .

क्या KTM 125 Duke कमाल दिखा पाएगी

कीमत के लिहाज से तो शायद KTM दूसरी बाइक को टक्कर नहीं दे पाएगी. लेकिन कीमत के लिहाज से KTM इस सेगमेंट की सबसे महंगी बाइक है.

ग्लेमर, शाइन और बजाज V12 का दाम 70,000 रुपए के आसपास ही है. यानी KTM से करीब 50 हजार रुपए सस्ती. पर 70 हजार रुपए की इन बाइक में ABS नहीं है और ये स्पोर्ट्स बाइक भी नहीं हैं.

125cc बाइक सेगमेंट में ज्यादातर खरीदार के लिए दाम बेहद अहम होता है. फिर भी ऐसे खऱीदार जिन्हें स्पीड और सेफ्टी दोनों चाहिए उनके लिए ड्यूक अच्छा सौदा होगी.

वैसे KTM का असली मुकाबला 150cc रेंज की यामाहा R15 और सुजुकी Gixxer 150 SF से ज्यादा होगा और इसमें भी KTM आगे निकल सकती है.

जियो के तरफ से मिल रहा है 8 जीबी डाटा फ्री अपने उठाया इसका फायदा

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*Renews on Nov 27, 2018 12:49 AM

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एनडीए में बिखराव दिसंबर के पहले हप्ते में बीजेपी का साथ छोड़ देंगे उपेन्द्र कुशवाहा!

NDA में बिखराव: दिसंबर के पहले हफ्ते में BJP का साथ छोड़ देंगे उपेन्द्र कुशवाहा!
उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए से अलग होंगे ये बात तभी तय हो चुकी थी जब 20 नवंबर को बीजेपी के बिहार प्रभारी भूपेन्द्र यादव बिहार आए थे. इसके बाद से ही कुशवाहा ने अपनी फाइनल रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था.

एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर बड़ी रार के बीच एक बड़ी खबर ये आ रही है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए छोड़ने का फैसला कर लिया है. इसकी घोषणा वे दिसंबर के पहले हफ्ते में करेंगे. विश्वस्त सूत्रों से न्यूज 18 को इस बात की एक्सक्लूसिव जानकारी मिली है. ऐसा माना जा रहा है कि वाल्मीकिनगर में छह दिसंबर को होने वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की बैठक के बाद कुशवाहा खुद इस बात का ऐलान कर देंगे. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि आज मुंगेर में उन्होंने ऐलान कर दिया है कि अपमान के साथ वे एनडीए में नहीं बने रह सकते.

दरअसल उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए से अलग होंगे ये बात तभी तय हो चुकी थी जब 20 नवंबर को बीजेपी के बिहार प्रभारी भूपेन्द्र यादव बिहार आए थे. भूपेन्द्र यादव ने कुशवाहा के 30 नवंबर के अल्टीमेटम को ही खारिज कर दिया था.

बताया जा रहा है कि इसके बाद से ही कुशवाहा ने अपनी फाइनल रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था. अब तो उन्होंने ये भी साफ कर दिया है कि सीट शेयरिंग को लेकर वे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से नहीं मिलेंगे. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी से मिलने की बात वे जरूर कह रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि ये सिर्फ कहने भर के लिए ही है.

दरअसल उपेन्द्र कुशवाहा दो बड़ी रणनीति पर काम कर रहे हैं. एक तो ये कि वे एनडीए से सीटों की बारगेनिंग को इस स्थिति में ले आए हैं जहां बात बिगड़ ही जाएगी. ऐसा होता है तो वे अपने कार्यकर्ताओं के बीच यह कह पाने में सहज होंगे कि उन्होंने आखिर तक कोशिश की लेकिन एनडीए ने उनकी ‘कुर्बानी’ ले ली. जाहिर है सीट शेयरिंग के लिए बीजेपी को 30 नवंबर तक का अल्टीमेटम दिया जाना इसी रणनीति का हिस्सा भर है. एनडीए के ‘शहीद’ दिखने के साथ ही वे अंदरखाने दूसरी रणनीति पर भी काम कर रहे हैं.

अब लगभग ये बात साफ हो चुकी है कि शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल (एलजेडी) की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी में विलय की पूरी तैयारी कर चुके हैं. विलय की घोषणा एक से छह दिसंबर के बीच किसी भी दिन हो सकती है. इसके तुरंत बाद वे महागठबंधन में शामिल होने की भी घोषणा कर देंगे.

ये भी पढ़ें- क्या बिहार में ये तिकड़ी रखेगी थर्ड फ्रंट की नींव? जानें सियासी समीकरण

इस फैसले में भी एक विशेष रणनीति है. शरद यादव की पार्टी को साथ मिलाकर कुशवाहा महागठबंधन से सात से नौ सीटें अपने हिस्से में मांग रहे हैं. शरद यादव के साथ आने के बाद कुशवाहा की बारगेनिंग कैपिसिटी भी बढ़ जाएगी. ऐसा माना जा रहा है कुशवाहा को चार सीटें देने को राजी आरजेडी शरद यादव की पार्टी के विलय के बाद इस बात को मान भी जाएगी. जिस विश्वास के साथ महागठबंधन के नेता ये एलान कर रहे हैं कि कुशवाहा उनके साथ ही आएंगे, इस बात की पुष्टि भी हो रही है.

इसके साथ ही महागठबंधन के घटक दल विशेष रणनीति पर भी काम कर रहे हैं. इसके तहत 20-20 फॉर्मूले का खाका तैयार किया जा रहा है. इसमें 20 सीटें आरजेडी को और बाकी 20 सीटों में बाकी सभी दल आएंगे. कांग्रेस, रालोसपा (शरद यादव के साथ) और हम के बीच शेष 20 सीटें बांटी जाएंगी.

नीतीश कुमार के विरोध के नाम पर कुशवाहा ने पहले ही एक माहौल भी तैयार कर ही दिया है कि उन्हें बेइज्जत किया जा रहा है. उनकी ‘नीच’ राजनीति भी इसी रणनीति का हिस्सा है. इस बीच जहानाबाद से सांसद अरुण कुमार का साथ मिलना भी कुशवाहा के लिए बड़ा बूस्टअप माना जा रहा है. ऐसे में कुशवाहा का ये फैसला अवश्यंभावी माना जा रहा है कि वे एनडीए से अलग होने जा रहे हैं!

रिपोर्ट- रवि एस नारायण

CBI मामले में बुरे फसे सरकार

सीबीआई में हस्तक्षेप करने वाले कई बड़े चेहरे होंगे बेनकाब

सीबीआई प्रकरण में अभी कई नए खुलासे होने बाकी हैं।

जांच एजेंसी के अधिकारी एमके सिन्हा के हलफनामे में तो एक मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और एक सचिव स्तर के अफसर पर ही सीधे तौर से सीबीआई में हस्तक्षेप करने का आरोप लगा है।

सूत्रों का कहना है कि सीबीआई की टेलीफोन टेपिंग इकाई (स्पेशल यूनिट) के जरिए कई और बड़े लोगों का नाम सामने आएगा, जिन्होंने समय-समय पर जांच एजेंसी के निदेशक, स्पेशल निदेशक, ज्वाइंट डायरेक्टर और यहां तक की चार-पांच बड़े मामलों में तो जांच अधिकारी (आईओ) के साथ भी बातचीत करने से गुरेज नहीं किया।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के केस में तो एक केंद्रीय मंत्री ने इतनी अधिक दिलचस्पी दिखाई कि उसने चार्जशीट दाखिल करने, कोर्ट में कोई जवाब फाइल करने या गिरफ्तारी जैसा कदम उठाने से पहले उससे सलाह लेने का निर्देश दे दिया था।

सीबीआई अधिकारियों ने भी दो बार उक्त मंत्री के पास केस की फाइलें भिजवाई थी। केस की जांच से जुड़े एक सूत्र ने तो इतना तक दावा किया है कि वह मंत्री निदेशक से मिलना भी चाहते थे।

हालांकि निदेशक एवं केस के जांच अधिकारी ने इस बाबत मंत्री को मुलाकात के लिए साफ इंकार कर दिया था।

मोईन कुरैशी केस के अलावा नीरव मोदी और विजय माल्या के केस में मंत्री की कथित बातचीत सामने आई है।

एक अन्य कैबिनेट मंत्री, जिन्होंने प्रवर्तन निदेशालय के मामलों में खासी रुचि दिखाई है, का नाम भी सीबीआई में हस्तक्षेप करने वाले नेताओं की सूची में शामिल है।

इनके अतिरिक्त दो पूर्व आईपीएस अधिकारी, जो सेवानिवृत्ति के बाद केंद्र में बड़े ओहदे पर नियुक्ति पा गए हैं, भी सीबीआई की कार्यप्रणाली में लगातार रुचि (हस्तक्षेप) करते रहे हैं।

सीबीआई अधिकारी एमके सिन्हा ने तो सीवीसी पर ही आरोप लगाया है, लेकिन टेपिंग में उनके जैसे ओहदे पर बैठे एक अन्य अधिकारी भी जांच-एजेंसी को निर्देश देते पाए गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक, सिन्हा के हलफनामे में तो कानून मंत्रालय के सचिव का नाम सामने आया है, जबकि इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के चार ज्वाइंट सेक्रेटरी भी शामिल हैं।

फोन टेपिंग के लिए दूसरे राज्य की स्पेशल यूनिट से मदद लेने का प्रयास

उस वक्त जब आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच चल रही तनातनी अपने चरम पर थी, तब सीबीआई के बड़े अधिकारी ने दूसरे राज्य की पुलिस से जांच एजेंसी में कार्यरत अफसरों के फोन टेप कराने का प्रयास हुआ था।

सूत्रों का दावा है कि यह प्रयास सीबीआई में दोनों खेमों की ओर से किया गया है। इसमें एक आला अधिकारी जो सीबीआई में आने से पहले जिस राज्य में थे, ने वहां की एक सैल से इस मामले में मदद मांगी थी।

बताया जाता है कि जांच एजेंसी के दूसरे बड़े अधिकारी ने दूर के राज्य की स्पेशल इकाई को कुछ मोबाइल नंबर भी दिए थे।

सीबीआई के एक आला अफसर को जब अपने यहां की स्पेशल यूनिट से मदद नहीं मिली तो उन्होंने दूसरे राज्य में संपर्क किया था।बताया जाता है कि उक्त सीबीआई अधिकारी के संबंधित राज्य के पुलिस मुखिया के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं। उनकी नियुक्ति में भी सीबीआई के उक्त अधिकारी का हाथ रहा है। इसी मामले में एक राज्य के मुख्यमंत्री से भी कुछ ऐसी ही मदद मांगी गई थी।

सीबीआई के अलावा केंद्र की अन्य जांच इकाइयां और राज्य पुलिस भी जरूरत पड़ने पर आरोपी या शिकायतकर्ता का फोन टेप कर सकती है।

यदि बड़े अधिकारी का फोन टेप करना होता है तो उसके लिए गृह मंत्रालय की इजाजत पड़ती है।

आपात स्थितियों में बिना किसी मंजूरी के भी टेपिंग हो सकती है। इसके लिए सर्विस प्रोवाइडर को लिखित में दे दिया जाता है कि संबंधित अधिकारी से 15 दिनों के अंदर इजाजत ले ली जाएगी।

देश में पहले भी होती रही हैं फोन टेपिंग की घटनाएं

एस्सार ग्रुप पर सुप्रीम कोर्ट के वकील सुरेन उप्पल ने 2016 में एक जनहित याचिका में आरोप लगाया था है कि ग्रुप ने 2001 से 2006 तक एनडीए और यूपीए सरकार के कई कैबिनेट मंत्रियों का फोन टेप कराया था। उन्होंने मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी जैसे कारोबारी दिग्गजों का फोन भी टेप होने की बात कही थी। इतना ही नहीं, सुरेन उप्पल ने कहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान पीएमओ में कार्यरत एक अधिकारी का भी फोन टेप किया गया था।

बता दें कि सुरेन उप्पल एस्सार ग्रुप के उस कर्मचारी के वकील रहे हैं, जिस पर कथित तौर पर फोन टैपिंग का आरोप लगा था।

इतना ही नहीं, वकील की शिकायत के मुताबिक, तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु, पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल, राम नाईक, अनिल अंबानी की पत्नी टीना अंबानी और कई टॉप ब्यूरोक्रेट्स के फोन टेप किए गए थे।

इसके साथ ही सपा नेता अमर सिंह, तत्कालीन सीनियर नौकरशाह और यहां तक कि गृह सचिव राजीव महर्षि का भी नाम सामने आया था।

बतौर सुरेन, एनडीए सरकार में मंत्री रहे प्रमोद महाजन का फोन भी टेप किया गया था।

टेलीकॉम लाइसेंसिंग के सिलसिले में भी कई लोगों के फोन सर्विलांस पर थे। हालांकि एस्सार ग्रुप ने अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया था।

पिछले साल भी सीबीआई पर कथित रूप से एक केंद्रीय मंत्री का फोन टेप करने का आरोप लगा था। बाद में जाँच एजेंसी ने इस आरोप को पूरी तरह से झूठा और दुर्भावनापूर्ण बताया था।

फोन टेपिंग मामले में विपक्ष का केंद्र सरकार पर हमला

कांग्रेस ने सीबीआई में चल रहे झगड़े के बीच केंद्रीय जांच ब्यूरो के डीआईजी एमके सिन्हा के दावों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोला है।

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, मोदी सरकार की नाक के नीचे मंत्री घूस ले रहे हैं और पीएमओ से मंत्री चोरों को बचाने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी बताएं कि करोड़ों की घूस लेकर केंद्रीय कोयला और खान राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने पीएमओ के किस मंत्री के जरिए सीबीआई पर आरोपियों को बचाने का दबाव बनाया था।

एनएसए अजीत डोभाल पर उठे सवालों को लेकर उन्होंने कहा, सीबीआई अधिकारी के हलफनामें में साफ लिखा है कि एक आरोपी जब पकड़ा गया तो उसने ‘अजीत डोभाल’ के नाम की धौंस दिखाई

मार्च तक बंद हो सकते हैं देश के 50% एटीएम

मार्च तक बंद हो सकते हैं देश के 50% एटीएम

देश के 50 फीसदी ATM मार्च 2019 तक बंद हो सकते हैं. कंफेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री (CATMi) के मुताबिक, हजारों की संख्या में एटीएम को ऑपरेट करना कंपनियों के लिए आर्थिक तौर पर फायदेमंद नहीं है. ऐसे में कंपनियां मार्च 2019 तक 1 लाख 13 हजार ATMs को बंद कर सकती हैं. इसमें करीब 1 लाख ऑफ-साइट एटीएम और 15 हजार से ज्यादा व्हाइट लेबल एटीएम हैं

देश में करीब 2 लाख 38 हजार ATMs हैं. जाहिर है आधे से ज्यादा एटीएम बंद हो जाने का असर शहरी और ग्रामीण आबादी पर होगा.

CATMi के बयान के मुताबिक, जो ATMs बंद हो सकते हैं, उनमें से ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में हैं. ऐसे में कैश की कमी की वजह से इसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.

आखिर क्यों ‘परेशान’ हैं ATM कंपनियां?

CATMi का मानना है कि नए नोट के बाजार में आने और दूसरे बदलावों के कारण कंपनियों को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर (रीकेलिब्रेशन) पर खर्च करना होता है.

आपको याद होगा कि नोटबंदी के वक्त एटीएम से पैसे नहीं निकल नहीं रहे थे क्योंकि 500 और 2,000 के नए नोट की डिजाइन मौजूदा एटीएम के साइज के हिसाब से फिट नहीं थी. इसके बाद 200 और 100 के नए नोट आए. हर बार जब नए दूसरे साइज के नोट आते हैं तो एटीएम के रीकेलिब्रेशन की जरूरत पड़ती है.

इसके अलावा कैश मैनेजमेंट, कैश लोडिंग और एटीएम को चलाने की दूसरी प्रकियाओं के कारण भी अब ये ज्यादा फायदे का सौदा नहीं रह गया है, जिसका नतीजा ATMs की बंदी है.

बीजेपी और जेडीयू मै दरार बढ़ती जा रही हैं

The quint news

बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच दरार बढ़ती जा रही है. हालांकि 2019 को लेकर सीट बंटवारे के मद्देनजर एनडीए के साझेदारों में अभी बातचीत शुरू नहीं हुई है, लेकिन बीजेपी के सहयोगी जेडीयू ने अभी से सीटों को लेकर मोलभाव करना और तेवर दिखाना शुरू कर दिया है. सोमवार को जेडीयू ने बीजेपी को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि उसे अपने नेताओं को सुर्खियां बनाने की आदतों को काबू में रखना चाहिए.

जेडीयू के तेवर
जेडीयू की तरफ से पहले ही ऐलान कर दिया गया है कि वह कम से कम 25 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और राज्य में बड़ी पार्टी वही होगी. जेडीयू के नेता संजय सिंह ने सोमवार को बयान दिया है कि बिहार में बीजेपी के जो नेता सुर्खियां बनना चाहते हैं, उन्हें नियंत्रण में रखा जाना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि 2014 और 2019 के बहुत अंतर है. बीजेपी को पता है कि वह बिहार में बिना नीतीश कुमार के साथ चुनाव जीतने में सक्षम नहीं होगी. अगर बीजेपी को सहयोगियों की जरूरत नहीं है, तो वह बिहार में सभी 40 सीटों पर लड़ने के लिए आजाद है.

मांझी ने नीतीश के महागठबंधन में लौटने पर शर्त रखी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कभी करीबी रहे पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मंझी ने सोमवार को नीतीश के महागठबंधन में लौटने पर शर्त रख दी है. हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतनराम मांझी ने दो टूक कहा है कि अगर नीतीश महागठबंधन में लौटते भी हैं, तब भी तेजस्वी यादव ही 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे. मांझी ने कहा, “अगर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद त्यागकर महागठबंधन में शामिल हो जाते हैं तो भी मुझे लगता है कि तेजस्वी प्रसाद 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में हमारे महागठबंधन के उम्मीदवार होंगे.”

उन्होंने लोकसभा चुनाव में एनडीए में शमिल जेडीयू के ज्यादा सीटों की मांग पर कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने सिर्फ दो सीटें ही जीती थी, ऐसे में ज्यादा सीटों पर उसका दावा ही नहीं बनता है.

वित्त मंत्री जी क्रूड 30%सस्ता तो पेट्रोल डीजल सिर्फ 10% क्यों

वित्तमंत्री जी, क्रूड 30% सस्ता तो पेट्रोल-डीजल सिर्फ10% क्यों?

वित्तमंत्री जी से एक सवाल- एक महीने में क्रूड 30 परसेंट सस्ता हो गया है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम सिर्फ 10 परसेंट ही कम हुए, ज्यादा क्यों नहीं?

मंगलवार की रात को अंतरराष्ट्रीय मार्केट में क्रूड के दाम 7 परसेंट गिर गए, फिर भी बुधवार की सुबह घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम में एक पैसे भी कमी नहीं की गई.

सरकार दलील देती है कि पेट्रोल-डीजल के दाम सरकार नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार तय करता है, फिर क्रूड सस्ता होने के बाद दाम कम क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

क्रूड 75 डॉलर से घटकर 63 डॉलर

एक महीने में दिल्ली में पेट्रोल के दाम 84 रुपए लीटर से घटकर करीब 76 रुपए तक खिसके हैं] मतलब 8 रुपए प्रति लीटर की कमी. इसी तरह डीजल करीब 8 रुपए घटकर 71.27 रुपए तक आया है. अब इसी के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय मार्केट में क्रूड के भाव देखें, तो ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर से अब ब्रेंट 63 डॉलर तक आ गया है.

वैसे पेट्रोल और डीजल के दामों में गिरावट का सिलसिला 5 अक्टूबर से शुरू हुआ था. तब सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों ने मिलकर 2.5 रुपए लीटर दाम घटाए थे. इसमें एक्साइज ड्यूटी 1.5 रुपए प्रति लीटर की कमी शामिल है और सरकारी कंपनियों से 1 रुपए प्रति लीटर का बोझ उठाने को कहा गया था.

रुपया भी सस्ता और क्रूड भी सस्ता

भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम पर दो बातों का असर पड़ता है:

  • क्रूड के भाव
  • डॉलर के मुकाबले रुपया

रुपए के मोर्चे पर भी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को राहत मिली है. लगातार डॉलर के मुकाबले 74 के आसपास चल रहा रुपया अब 72 के नीचे आ गया है.

सरकार ने भी उस वक्त महंगे पेट्रोल-डीजल के लिए महंगे क्रूड के साथ-साथ रुपए की गिरावट को जिम्मेदार ठहराया था. इसका सीधा रिश्ता यही है कि क्रूड इंपोर्ट होता है और रुपये के कमजोर होने से क्रूड और महंगा हो जाता है.

पेट्रोल से ज्यादा महंगा डीजल

डीजल कई राज्यों में पेट्रोल से महंगा हो गया है. 7 साल पहले इसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था. तब दोनों के बीच 30 रुपए लीटर का फर्क था, जो घटते-घटते 5 रुपए से भी कम रह गया.

गुजरात, ओडिशा और पोर्ट ब्लेयर में तो डीजल ज्यादा महंगा हो गया है. पेट्रोल के मुकाबले डीजल महंगा होने की वजह है कि कई राज्यों में डीजल में ज्यादा वैट है.

डीजल पर पेट्रोल से ज्यादा VAT वाले राज्य

गोवा में VAT

  • पेट्रोल -12.82%
  • डीजल -15.03%

गुजरात में VAT

  • डीजल पर 22.28%
  • पेट्रोल पर 22.19%

ओडिशा

  • डीजल पर 25.08%
  • पेट्रोल 24.63%

पेट्रोल-डीजल के दाम कैसे तय होते हैं?

पेट्रोल और डीजल के दाम टेक्निकल तौर पर डीकंट्रोल हैं, यानी कंपनियों को दाम तय करने का अधिकार है. भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम रोज बदलते हैं. पेट्रोलियम कंपनियां क्रूड की 15 दिन की औसत कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपए के भाव से दाम तय करती हैं.

The quint report

सुबह की ताज़ा खबर

By। the quint today

जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की सारी कोशिशें नाकाम

जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से सरकार बनने की संभावना अचानक खत्‍म हो गई है. पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने राज्‍यपाल को चिट्ठी लिखकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था, इसके बाद गवर्नर ने विधानसभा भंग कर दी. PDP कुल 56 विधायकों के समर्थन का दावा कर रही थी. पार्टी ने नेशनल कॉन्‍फ्रेंस और कांग्रेस का भी समर्थन हासिल होने की बात कही थी. लेकिन राजभवन ने नोटिफिकेशन जारी कर इस गठजोड़ की उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया. महबूबा मुफ्ती कहा कि प्रदेश में एक महागठबंधन के आइडिया ने BJP को बेचैन कर दिया. नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि उनकी पार्टी पांच महीनों से विधानसभा भंग किये जाने का दबाव बना रही थी. लेकिन महबूबा मुफ्ती के दावा पेश किये जाने के कुछ ही मिनटों के भीतर अचानक विधानसभा को भंग करने का ऑर्डर आ गया.

देश के 50% ATM हो सकते हैं बंद

देश के 50 फीसदी ATM मार्च 2019 तक बंद हो सकते हैं. कंफेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री (CATMi) के मुताबिक, हजारों की संख्या में एटीएम को ऑपरेट करना कंपनियों के लिए अब फायदेमंद नहीं रह गया है. कंपनियां मार्च 2019 तक 1 लाख 13 हजार ATMs को बंद कर सकती हैं. इसमें करीब 1 लाख ऑफ-साइट एटीएम और 15 हजार से ज्यादा व्हाइट लेबल एटीएम हैं.CATMi का कहना है कि नए नोटों के बाजार में आने और दूसरे बदलावों से एडजस्ट करने में उनकी लागत बढ़ रही है.

पहले T-20 में 4 रनों से हारी टीम इंडिया

इंडिया-ऑस्ट्रेलिया सीरीज के पहले टी-20 मैच में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 4 रनों से हरा दिया . टीम इंडिया के सामने डकवर्थ लुईस नियम के तहत 174 रन का टारगेट था, लेकिन टीम इंडिया इस टारगेट का पीछा करते हुए 7 विकेट खोकर सिर्फ 169 रन ही बना पाई. इस मैच में भारत के लिए शिखर धवन ने 76 रन की शानदार पारी खेली. वहीं ऑस्ट्रेलियन गेंदबाज एडम जंपा और मार्कस स्टॉइनिस ने दो-दो विकेट झटके.

स्पेशल इलेक्शन कवरेज

विधानसभा चुनाव पर क्विंट स्पेशल इलेक्शन कवरेज कर रहा है, इस कवरेज में आपको मिलेंगे लीक से हटकर दिलचस्प किस्से. सियासत की जमीनी हकीकत और लोगों के अपने मुद्दे. मध्यप्रदेश के चुनावी कवरेज में हमने बात की बीजेपी के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय से. ये इंदौर से चुनाव लड़ रहे हैं पार्टी में बागियो के सवाल पर उन्होंने क्या कहा सुनिए

वॉट्सऐप को मिला नया इंडिया हेड

मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप ने भारत सरकार की कई मागों से एक अहम मांग को मान लिया. वॉट्सऐप ने बुधवार को भारत में अपने इंडिया हेड के रूप में अभिजीत बोस को अपॉइंट किया. वॉट्सऐप ने भारत में अपने इंडिया हेड की नियुक्ति ऐसे समय में की है, जब सरकार फेक न्यूज पर रोक लगाने के लिए कंपनी पर दबाव डाल रही है. सरकार ने वॉट्सऐप को एक लोकल टीम बनाने को भी कहा था जो शिकायतों को दूर कर सके. अभिजीत बोस इसके पहले ईजटैप के को-फाउंडर और सीईओ रह चुके हैं.

M P election परिवार बाद की आलोचना करने वाली बीजेपी अपने गिरेवा मै क्यों नहीं झांकती

मध्य प्रदेश: परिवादवाद की आलोचना करने वाली भाजपा अपने गिरेबां में क्यों नहीं झांकती

विशेष रिपोर्ट: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए जहां भाजपा ने क़रीब 21 प्रतिशत टिकट स्थापित नेताओं के परिजनों को बांटे हैं, वहीं कांग्रेस ने ऐसे 10 प्रतिशत उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं.

राजनीति में वंशवाद या परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं. जो कांग्रेस के आला नेतृत्व पर गांधी परिवार की एकतरफा कमान से लेकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) पर मुलायम सिंह यादव के ख़ानदान और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लालू प्रसाद यादव के ख़ानदान तक फैली हुई हैं.

गाहे-बगाहे परिवारवाद चुनावी मुद्दा भी बना है. राजनीतिक दलों की तरफ से परिवारवाद को बढ़ावा न दिए जाने वाले झूठे दिलासे भी दिए गए हैं. लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला है.

अगर बात करें परिवारवाद के विरोध की तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस मामले में शीर्ष पर रही है. कांग्रेस के परिवारवाद को मुद्दा बनाकर जहां वह केंद्र में सरकार बनाए बैठी है तो वहीं उत्तर प्रदेश में सपा के परिवारवाद को भी उसने विधानसभा चुनावों में ख़ूब भुनाया था.

लेकिन, उसी भाजपा ने इस बार के विधानसभा चुनावों के लिए मध्य प्रदेश में टिकट वितरण के मामले में परिवारवाद को बढ़ावा देने में कीर्तिमान स्थापित किया है.

28 नवंबर को प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के प्रत्याशियों की घोषणा करते वक़्त भाजपा ने करीब 21 प्रतिशत टिकट स्थापित नेताओं के परिजनों को बांटे हैं.

कुछ 230 टिकट में से 48 टिकट पार्टी की ओर से विभिन्न नेताओं को परिजनों को दिए गए हैं.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस इस मामले में पीछे रही हो. उसने 10 प्रतिशत (23) प्रत्याशी मैदान में ऐसे उतारे हैं जो कि परिवारवाद की श्रेणी में आते हैं.

इस तरह देखें तो प्रदेश के दोनों ही मुख्य दलों ने 230 सीटों पर 71 प्रत्याशी ऐसे उतारे हैं जो कि वंशवाद की बेल को आगे बढ़ा रहे हैं.

भाजपा की ओर से नेताओं के परिजनों को मिले 48 टिकटों में से 34 पुत्र-पुत्रियों को तो 14 अन्य परिजनों को मिले हैं तो वहीं कांग्रेस की ओर से दिए गए 23 टिकटों में से 14 पुत्र-पुत्रियों और नौ अन्य परिजनों को बांटे गए हैं.

मध्य प्रदेश को क्षेत्रवार बांटते हुए परिवारवाद का ज़िक्र करें तो मालवा-निमाड़ में सबसे ज़्यादा 26 टिकट, मध्य भारत में 17, बुंदेलखंड में 9, विंध्य में 8, ग्वालियर-चंबल में 6 और महाकौशल में 5 टिकट नेताओं के परिजनों को मिले हैं.

भाजपा ने मालवा-निमाड़ में सबसे ज़्यादा (20) तो कांग्रेस ने मध्य भारत और मालवा-निमाड़ में सबसे ज़्यादा (6-6) नेताओं के परिजनों को टिकट बांटे हैं.

ये 71 प्रत्याशी कुल 68 सीटों पर उतारे गए हैं. छतरपुर, सिरमौर और लांजी सीटों पर मुकाबला वंशवाद बनाम वंशवाद उम्मीदवारों के बीच होगा. इस तरह प्रदेश की लगभग 30 प्रतिशत सीटों पर वंशवाद हावी है.

वंशवाद के चलते टिकट बांटने में भाजपा आगे है तो एक ही परिवार में कई टिकट बांटने के मामले में कांग्रेस ने बाजी मारी है.

गौरतलब है कि भाजपा ने टिकट वितरण से पहले घोषणा की थी कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलेगा. टिकट बांटते समय पार्टी ने इसे ध्यान में रखा. इसलिए कैलाश विजयवर्गीय और शिवराज के मंत्री गौरीशंकर शेजवार जैसे दिग्गजों को अपने बेटों को टिकट दिलाने के एवज में अपना टिकट कुर्बान करना पड़ा है.

भाजपा में केवल संजय शाह और विजय शाह दोनों भाई एक ही परिवार से टिकट पाने में कामयाब रहे हैं. दोनों ही वर्तमान विधायक हैं.

लेकिन, कांग्रेस में ऐसी कोई नीति नहीं थी. इसलिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने परिवार में तीन टिकट, पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के परिवार में दो टिकट, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद कांतिलाल भूरिया के परिवार में दो टिकट और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के परिवार में भी दो टिकट आवंटित किए गए हैं.

भाजपा द्वारा पुत्र-पुत्रियों को बांटे गए टिकटों की सूची

दिव्यराज सिंह: सिरमौर से टिकट मिला है. पूर्व विधायक पुष्पराज सिंह के बेटे हैं. पुष्पराज सिंह पिछले दिनों भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

शिवनारायण सिंह: बांधवगढ़ से टिकट मिला है. शहडोल के सांसद ज्ञान सिंह के बेटे हैं.

विक्रम सिंह: रामपुर बघेलन से टिकट मिला है. भाजपा की वर्तमान शिवराज सरकार में जल संसाधन मंत्री हर्ष सिंह के बेटे हैं. पिछले चुनाव में इस सीट पर हर्ष सिंह ने जीत दर्ज की थी. हर्ष सिंह प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के बेटे हैं. इस बार तीसरी पीढ़ी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है.

देवेंद्र वर्मा: वर्तमान विधायक खंडवा सीट से मैदान में हैं. पूर्व विधायक और मंत्री किशोरीलाल वर्मा के पुत्र हैं. किशोरीलाल की 2006 में हत्या कर दी गई थी. वे 90 के दशक की भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री रहे थे.

मंजू दादू: नेपानगर से चुनाव लड़ रही हैं. इसी सीट पर उनके पिता राजेंद्र दादू विधायक हुआ करते थे. जिनकी एक कार दुर्घटना में 2016 में मौत हो गई थी. बाद में उपचुनाव में भाजपा ने मंजू को मैदान में उतारा और वे जीतीं. अब भाजपा ने फिर उन पर भरोसा जताया है.

अर्चना चिटनिस: बुरहानपुर से मैदान में उतारी गई हैं. शिवराज सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं. इनके पिता बृजमोहन मिश्र भाजपा सरकार में विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री भी रहे थे.

अनिल फिरोजिया: तराना से चुनाव लड़ेंगे. ये आगर सीट से पूर्व विधायक भूरेलाल फिरोजिया के पुत्र हैं. इनकी बहन रेखा रत्नाकर पिता के निधन के बाद आगर सीट से विधायक रह चुकी हैं.

राजेंद्र पांडे: मंदसौर से आठ बार सांसद रहे लक्ष्मीनारायण पांडे के बेटे हैं. जावरा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं.

राधेश्याम पाटीदार: सुवासरा सीट से लड़ रहे हैं. वे पूर्व विधायक नानालाल पाटीदार के पुत्र हैं. 2008 में जब पहली बार मैदान में उतरे तो वंशवाद को लेकर इनका विरोध भी हुआ था. 2013 में वंशवाद के आरोप लगाकर पार्टी कार्यकर्ता इनके ख़िलाफ़ खड़े हो गए थे. नतीजतन इनकी हार हुई. लेकिन इस बार फिर मैदान में इन्हें उतारा गया है.

यशपाल सिंह सिसौदिया: मंदसौर से मैदान में हैं और पूर्व विधायक किशोर सिंह सिसोदिया के बेटे हैं.

माधव मारू: मनासा सीट से चुनाव लड़ेंगे. वे भाजपा नेता रामेश्वर मारू के पुत्र हैं. रामेश्वर मारू संघ के क़रीबी माने जाते थे. लेकिन भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा से मतभिन्नता के चलते टिकट नहीं पा सके थे. लेकिन भाजपा ने अब उनके पुत्र पर भरोसा जताया है.

जितेंद्र पंड्या: बड़नगर से टिकट मिला है. उनके पिता उदय सिंह पंड्या तीन बार विधायक रहे थे.

ओमप्रकाश सकलेचा: जावद से चुनावी मैदान में हैं. पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा के पुत्र हैं.

दीपक जोशी: हाटपिपल्या से भाजपा उम्मीदवार हैं. पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे हैं.

आकाश विजयवर्गीय: सूची में सबसे चर्चित नामों में से एक हैं. भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और अंबेडकर नगर से विधायक कद्दावर कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं. कैलाश ने अपने बेटे की राजनीति चमकाने अपनी सीट कुर्बान की है.

आकाश इंदौर-1 से उम्मीदवार हैं.

जितेंद्र गहलोत : आलोट से उम्मीदवार हैं. सांसद और केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के बेटे हैं.

मनोज पटेल: देपालपुर से मैदान में हैं. सुंदरलाल पटवा की सरकार में मंत्री रहे तीन बार के विधायक निर्भय सिंह पटेल के बेटे हैं. वर्तमान विधायक हैं.

अजीत बौरासी: कांग्रेस से सांसद रहे प्रेमचंद गुड्डू के बेटे हैं. प्रेमचंद गुड्डू और अजीत बोरासी ने नामांकन के तीन रोज़ पहले ही कांग्रेस छोडकर भाजपा का दामन थामा है. बदले में भाजपा ने प्रेमचंद के बेटे को घट्टिया से मैदान में उतारा है.

राजेंद्र वर्मा: सोनकच्छ से मैदान में उतारे गए हैं. उनके पिता फूलचंद वर्मा इसी सीट से विधायक रहे हैं.

सुधीर यादव: सुरखी से चुनाव लड़ रहे हैं. सागर से सांसद लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे हैं. सुधीर यादव इस वजह से भी विवादों में रहे हैं कि वे अपने पिता की सांसदी का दुरुपयोग करते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों में पिता की जगह स्वयं सांसद बनकर पहुंच जाते हैं.

हरवंश राठौर: बंडा से टिकट मिला है. प्रदेश सरकार में मंत्री रहे हरनाम सिंह राठौर के बेटे हैं. हरनाम के निधन के बाद बंडा सीट पर 2013 से उनकी विरासत हरवंश संभाल रहे हैं.

राजेश प्रजापति: चंदला से वर्तमान विधायक आरडी प्रजापति के बेटे हैं. पार्टी ने इस बार पिता का टिकट बेटे को दिया है.

प्रणय पांडे: पूर्व विधायक प्रभात पांडे के बेटे हैं. बहोरीबंद सीट से मैदान में हैं. 2014 में पिता की मौत के बाद भाजपा ने उपचुनाव में उन पर भरोसा जताया था. तब वे हार गए थे.

संजय पाठक: विजयराघवगढ़ से मैदान में हैं. प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे सत्येंद्र पाठक के बेटे हैं. 2008 से विधायक हैं. 2014 तक कांग्रेस में थे.

यशोधरा राजे: इन्हें शिवपुरी से टिकट दिया गया है. वे भाजपा की संस्थापक रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया की पुत्री हैं, तो वहीं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की बहन और मध्य प्रदेश सरकार में शहरी विकास मंत्री माया सिंह की भांजी हैं. कांग्रेसी सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की वे बुआ हैं.

मुदित शेजवार: सांची से विधायक और शिवराज कैबिनेट के मंत्री गौरीशंकर शेजवार के बेटे हैं. पिता की सीट पर इस बार उन्हें मौका मिला है.

हेमंत खंडेलवाल: बैतूल विधायक हैं. फिर से मैदान में हैं. उनके पिता विजय खंडेलवाल बैतूल से सांसद थे. 2007 में निधन हो गया तो उपचुनाव में पिता की सीट पर भाजपा ने बेटे को उतार दिया था. सांसदी उन्हें रास न आई तो विधायकी लड़ ली.

महेंद्र सिंह चौहान: भेंसदेही से चुनाव लड़ेंगे. इनके पिता केशर सिंह चौहान भी इसी सीट से विधायक रहे थे. महेंद्र तीन बार के विधायक हैं.

आशीष शर्मा: खातेगांव सीट से प्रत्याशी हैं. वर्तमान विधायक हैं. इनके पिता भी इसी सीट से विधायक रहे.

कुंवर कोठार: सारंगपुर से पांच बार विधायक रहे अमरसिंह कोठार के बेटे हैं. पिता की सीट 2013 में विरासत में मिली थी.

विश्वास सारंग: शिवराज सरकार में मंत्री हैं. भोपाल के नरेला से विधायक हैं. इनके पिता कैलाश नारायण सारंग सांसद रहे हैं.

फ़ातिमा रसूल सिद्दीक़ी: भोपाल उत्तर से भाजपा की एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार हैं. उनके पिता रसूल अहमद सिद्दीक़ी कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे थे. इसी सीट से वे विधायक रहे थे. फातिमा ने नामांकन की तारीख़ से दो दिन पहले ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा है.

अशोक रोहाणी: पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी के बेटे जबलपुर कैंट सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. इसी सीट पर उनके पिता ईश्वरदास भी लड़ा करते थे.

रमेश भटेरे: लांजी से टिकट मिला है. उनके पिता दिलीप भटेरे इसी सीट से चार बार विधायक रहे थे और निधन से पहले उमा भारती सरकार में मंत्री भी रहे.

भाजपा द्वारा बांटे गए अन्य परिजनों को टिकटों की सूची

गायत्री राजे: पूर्व मंत्री तुकोजीराव पवार की पत्नी हैं. देवास विधायक तुकोजीराव का निधन 2015 में हो गया था जिसके बाद भाजपा ने उपचुनाव में उनकी पत्नी गायत्री राजे को उतारा और वे भारी बहुमत से जीत गईं. देवास से इस बार भी पार्टी ने उन पर भरोसा जताया है

मालिनी गौड़ : इंदौर-4 से मैदान में उतारी गई हैं. वे इंदौर की वर्तमान महापौर हैं. प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मण सिंह गौर की पत्नी हैं. 2008 में एक कार दुर्घटना में लक्ष्मण की मौत के बाद पार्टी ने मालिनी को उनकी सीट इंदौर-4 से मैदान में उतारा था. वे 2015 तक विधायक रहीं और 2015 में इंदौर की महापौर का चुनाव जीता.

विजय शाह: शिवराज सिंह चौहान सरकार में मंत्री हैं. हरसूद से चुनाव मैदान में हैं. टिमरनी विधायक संजय शाह के भाई हैं.

अर्चना सिंह: छतरपुर से उम्मीदवार हैं. छतरपुर जिलाध्यक्ष पुष्पेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी हैं.

उमाकांत शर्मा: व्यापमं घोटाले में फंसे शिवराज सरकार के पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के भाई हैं. सिरोंज सीट से भाजपा का टिकट मिला है.

राजश्री सिंह: शमशाबाद से टिकट मिला है. वे कांग्रेस से पूर्व विधायक रहे रुद्रप्रताप सिंह की पत्नी हैं. स्वयं कांग्रेस पार्टी में रहते हुए ज़िला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं.

सरला रावत: सबलगढ़ विधायक मेहरबान सिंह रावत की पत्नी हैं. पति की सीट पर इस बार वे ताल ठोक रही हैं.

राकेश चौधरी: भिंड से उम्मीदवार बनाए गए हैं. विधायक मुकेश चौधरी के भाई हैं. 2013 चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे. समझौते के तहत अपने भाई को मेहगांव से टिकट दिलाने में सफल रहे थे. इस बार स्वयं मैदान में हैं.

नीना वर्मा: धार से चुनाव मैदान में हैं. केंद्र और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे विक्रम वर्मा की पत्नी हैं.

अनूप मिश्रा: भितरवार से टिकट मिला है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे हैं.

जालम सिंह पटेल: नरसिंहपुर से मैदान में हैं. शिवराज सरकार में मंत्री भी हैं. दमोह के सांसद प्रहलाद पटेल के भाई हैं.

संजय शाह: टिमरनी से उम्मीदवार हैं. वर्तमान विधायक हैं. हरसूद से विधायक और मंत्री विजय शाह के भाई हैं.

सुरेंद्र पटवा: वर्तमान विधायक भोजपुर से मैदान में हैं. पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे हैं. शिवराज सरकार में वर्तमान में मंत्री भी हैं.

कृष्णा गौर: पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की बहू हैं. बाबूलाल गौर की गोविंदपुरा सीट पर उनकी विरासत आगे बढ़ाएंगी. वे भोपाल की महापौर भी रही हैं.

कांग्रेस द्वारा पुत्र-पुत्रियों और अन्य परिजनों को बांटे गए टिकटों की सूची

कमलेश्वर पटेल: सिंहावल से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. इनके पिता इंद्रजीत पटेल प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे थे. 2013 में पिता की सीट विरासत में मिली.

सुंदरलाल तिवारी: गुढ़ से मैदान में हैं. पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के बेटे हैं. वर्तमान विधायक हैं.

अरुणा तिवारी: श्रीनिवास तिवारी की नातिन बहू और सुंदरलाल तिवारी की भतीजा बहू हैं. इनके पति विवेक तिवारी पिछली बार इसी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार थे. इस बार पत्नी को मैदान में उतारा है. इस तरह तिवारी परिवार में दो टिकट गए हैं.

अजय सिंह: चुरहट से चुनाव लड़ रहे अजय प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बेटे हैं. लगातार इस सीट पर विधायक हैं.

विक्रांत भूरिया: विक्रांत को झाबुआ सीट से मैदान में उतारा है. वह सांसद और पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के बेटे हैं.

कलावती भूरिया: सांसद कांतिलाल भूरिया की भतीजी हैं और जोबट से चुनाव मैदान में हैं. इस तरह कांतिलाल भूरिया अपने परिवार में बेटे और भतीजी को दो टिकट दिलाने में सफल रहे हैं.

राजेंद्र भारती: उज्जैन उत्तर से टिकट मिला है. इनके पिता भी विधायक रहे हैं.

राजेंद्र वशिष्ठ: उज्जैन दक्षिण से मैदान में उतरे हैं. इनके पिता महावीर प्रसाद वशिष्ठ यहां से दो बार विधायक रह चुके हैं.

सचिन यादव: पूर्व कांग्रेस दिग्गज सुभाष यादव के बेटे हैं. कसरावद से मैदान में हैं. उनके भाई अरुण यादव बुदनी से चुनाव लड़ रहे हैं.

अरुण यादव: पूर्व सांसद और पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बुदनी से शिवराज सिंह चौहान के सामने चुनावी मैदान में हैं. सुभाष यादव के बेटे हैं और सचिन यादव के भाई हैं. परिवार में इस तरह दो टिकट गए हैं.

उमंग सिंघार: पूर्व उपमुख्यमंत्री जमुनादेवी के भतीजे गंधवानी सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं.

आलोक चतुर्वेदी : सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी के भाई हैं. छतरपुर से मैदान में हैं.

रणवीर सिंह जाटव: पूर्व विधायक माखन जाटव के पुत्र हैं. गोहद से प्रत्याशी बनाए गए हैं. इनके पिता माखन जाटव की 2009 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान हत्या कर दी गई थी. बाद में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने रणवीर को आजमाया था और वे जीते थे.

हेमंत कटारे: कांग्रेस के मध्य प्रदेश सदन में पूर्व नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे के बेटे हैं. 2016 में सत्यदेव के निधन के बाद इस सीट की विरासत पार्टी ने उनके बेटे हेमंत को सौंप दी थी.

जयवर्द्धन सिंह: पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बेटे हैं. वर्तमान विधायक हैं. इनके चाचा लक्ष्मण सिंह भी चाचौड़ा से कांग्रेस उम्मीदवार हैं.

लक्ष्मण सिंह: पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के छोटे भाई चाचौड़ा से उम्मीदवार हैं. भतीजे जयवर्द्धन राघोगढ़ से मैदान में हैं.

प्रियव्रत सिंह: खिलचीपुर से मैदान हैं और ये भी पार्टी में दिग्विजय सिंह के कुनबे से हैं. उनके भतीजे हैं.

ओमप्रकाश रघुवंशी: सिवनी मालवा से मैदान में हैं. पांच बार के विधायक, पूर्व मंत्री और पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष हजारीलाल रघुवंशी के बेटे हैं.

सतपाल पालिया: सोहागपुर से लड़ रहे हैं और पूर्व विधायक अर्जुन पालिया के रिश्तेदार हैं.

अभय मिश्रा: भाजपा के टिकट पर 2008 में सेमरिया से विधायक रहे. वर्तमान में उनकी पत्नी नीलम मिश्रा सेमरिया से भाजपा विधायक हैं. अभय ने साल के शुरुआत में कांग्रेस का दामन थामा था और अब रीवा से शिवराज कैबिनेट के दिग्गज मंत्री राजेंद्र शुक्ला के ख़िलाफ़ ताल ठोक रहे हैं.

हिना कावरे: लांजी से विधायक हैं. कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे लिखीराम कावरे की बेटी हैं. लिखीराम की नक्सलियों ने मंत्री रहने के दौरान ही हत्या कर दी थी. इस सीट पर लिखीराम की पत्नी पुष्पलता भी चुनाव लड़ चुकी हैं.

रजनीश सिंह: केवलारी से मैदान में हैं. वर्तमान विधायक हैं. दिग्विजय सिंह सरकार में मंत्री रहे हरवंश सिंह के पुत्र हैं.

संजय सिंह मसानी: प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रिश्ते में साले लगते हैं. लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे. नामांकन की अंतिम तारीख़ से ठीक तीन रोज़ पहले कांग्रेस की दामन थाम लिया और वारासिवनी से टिकट भी मिल गया.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टी एक दूसरे पर हमेशा से दूसरे के खिलाफ रहे हैं

सीएनएन ट्रंप के सामने खड़ा हो सकता है तो भारतीय मीडिया सत्ता में बैठे लोगों से सवाल क्यों नहीं कर सकता ?

सीएनएन ट्रंप के सामने खड़ा हो सकता है, तो भारतीय मीडिया सत्ता से सवाल क्यों नहीं कर सकता ?

भारत के ज़्यादातर पत्रकार आज़ाद नहीं हैं बल्कि मालिक के अंगूठे के नीचे दबे हैं. वह मालिक, जो राजनेताओं के सामने दंडवत रहता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीएनएन संवाददाता जिम अकोस्टा को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश में ह्वाइट हाउस की इंटर्न. (फोटो: रॉयटर्स)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीएनएन संवाददाता जिम अकोस्टा को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश में ह्वाइट हाउस की इंटर्न. (फोटो: रॉयटर्स)

अपने वरिष्ठ संवाददाता जिम अकोस्टा के प्रेस पास निलंबित करने के फैसले को लेकर सीएनएन द्वारा व्हाइट हाउस के खिलाफ मुकदमा दायर करने के फैसले ने अमेरिका में भूचाल ला दिया है- और ज्यादातर अमेरिकी सीएनएन के समर्थन में निकल आए हैं.

भारत में ऐसा होने की संभावना कितनी है? 1975-77 के आपातकाल के दौरान जब इंदिरा गांधी ने सबके साथ प्रेस की भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया था, तब देश का मीडिया, लालकृष्ण आडवाणी के प्रसिद्ध शब्दों में रेंगने लगा, जबकि उसे सिर्फ झुकने के लिए कहा गया था.

2014 में वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष ने सीएनएन-आईबीएन (अब सीएनएन न्यूज 18) को तब अलविदा कह दिया जब प्रधानमंत्री के चहेते मुकेश अंबानी ने चैनल का अधिग्रहण कर लिया था.

मोदी कथित तौर पर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर उनसे पूछे गए असहज करनेवाले सवालों को लेकर नाखुश थे. उस समय प्रेस में किसी ने एक कतरा आंसू नहीं बहाया.

इंडिया टुडे टीवी पर करन थापर के शो को चैनल के प्रबंधन ने आगे नहीं बढ़ाया और यह बात सबको पता है कि करन थापर ने मोदी का इंटरव्यू लेते वक्त उन्हें नाराज़ कर दिया था.

कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य को सरकार पर सवाल खड़े करने वाले कार्टूनों को लेकर अनेक असहमतियों के बाद मेल टुडे द्वारा कह दिया गया कि अब उनकी जरूरत नहीं है. एक बार फिर किसी ने चूं तक नहीं कहा.

पुण्य प्रसून वाजपेयी और मिलिंद खांडेकर को राजनीतिक दबाव के कारण एबीपी द्वारा बर्खास्त कर दिया गया और क्षणिक हंगामे के बाद इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया गया.

कई लोगों ने यह सवाल पूछा है कि आखिर भारतीय मीडिया सीएनएन की तरह साहस का परिचय क्यों नहीं देता है. इस पर मैं अपनी राय प्रकट करने का जोखिम उठा रहा हूं.

भारत में जनमत अमेरिका या दूसरे विकसित देशों की तरह मजबूत नहीं है. यहां ज्यादातर लोग सत्ताधारियों के साथ टकराव मोल नहीं लेना चाहते हैं.
उदारहण के तौर पर जब इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा की थी (अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, न कि इसलिए कि भारत में वास्तव में कोई आपातकालीन स्थिति थी) और सारे मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया था और मीडिया पर सख्त पहरेदारी बिछा दी थी, तब इसको लेकर शायद ही कोई विरोध हुआ था.

कई लोगों ने इसे किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया और इसका एकमात्र अपवाद रामनाथ गोयनका और उनका इंडियन एक्सप्रेस समूह थे, जिन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. अगर अमेरिका या यूरोप में ऐसी कोई चीज हुई होती, तो वहां बड़े पैमाने के आंदोलन हुए होते और इसका विरोध किया जाता.

हालांकि तथ्य यह है कि पश्चिम की ही तरह भारत में भी मीडिया पर कारोबारियों का स्वामित्व है, लेकिन पश्चिमी कारोबारी सियासी नेताओं के सामने उतनी बार दंडवत नहीं होते हैं. बल्कि पश्चिम में नेतागण अक्सर कारोबारियों के सामने झुकते हैं.
इसके कई कारण हैं.

पहली बात, अगर भारत में कोई कारोबारी सत्ता में बैठे लोगों को नाराज कर देता है तो नेताओं द्वारा उन पर केंद्रीय जांच ब्यूरो, आयकर और कस्टम अधिकारियों या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को छोड़ दिया जाता है.

यह बात सर्वविदित है कि ये अधिकारी पिंजरे में बंद तोते हैं (जैसा तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था) और वे अपने राजनीतिक आकाओं का हुक्म बजाने के लिए तैयार रहते हैं भले ही इसके लिए उन्हें फर्जी सबूत ही क्यों न गढ़ने पड़ें.

दूसरी तरफ पश्चिमी देशों में, नौकरशाह कहीं ज्यादा पेशेवर हैं. मिसाल के लिए, अगर डोनाल्ड ट्रंप फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन या इंटरनल रिवेन्यू सर्विस को सीएनएन को परेशान करने का आदेश देते हैं, तो इस बात की संभावना काफी कम है कि वे उनके हुक्म का पालन करेंगे.

दूसरी बात, भारत में ज्यादातर मीडिया मालिक दूसरे कारोबारों में भी शामिल हैं और उनके अखबार या टीवी चैनल वास्तव में उनके दूसरे व्यवसायों को लाभ पहुंचाने या उनकी रक्षा करने का एक जरिया हो सकता है, जो ज्यादा मुनाफा देने वाले हैं.

तीसरी बात, ज्यादातर भारतीय पत्रकार अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता वाले हैं, भले भारत 1947 में आजाद हो गया हो. एक मंत्री या आईएएस अधिकारी के सामने वे एक हीनता ग्रंथि से भरे होते हैं, सिवाय उन स्थितियों के जब वे उसकी कमजोरी जानते हों. इसलिए उनमें शायद ही कभी विरोध करने का वैसा साहस होता है, जैसा सीएनएन ने दिखाया है.

अमेरिका और यूरोप में, एंडरसन कूपर, बॉब वुडवार्ड, बार्बरा वाल्टर्स, क्रिस्टिएन एमेनपोअर, फरीद ज़करिया और अन्य, हालांकि हैं कर्मचारी ही, लेकिन वे आंख मूंदकर मीडिया घराने के मालिकों का हुक्म नहीं मानेंगे और मालिकों के साथ उनके साथ सम्मान के साथ पेश आना होता है.
ऐसे पत्रकार मजबूत शख्सियत वाले हैं और उनके अपने नैतिक और पेशेवर मानक हैं, जिन्हें बनाए रखने के लिए वे अड़ जाते हैं.
इसलिए सीएनएन के मामले में, मेरा अनुमान है कि इसके मालिक टेड टर्नर ने जरूर ही ख्यातिनाम पत्रकारों से सलाह-मशविरा किया होगा, जिन्होंने उन्हें कहा होगा कि पूरे संगठन को जिम अकोस्टा के पीछे मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए और फर्स्ट अमेंडमेंट (प्रेस की स्वतंत्रता) को बचाने के लिए लड़ना चाहिए.

भारत में कोई भी मीडिया मालिक, चाहे वह सबसे बड़ा ही क्यों न हो, ऐसा कुछ करने की हिम्मत नहीं करेगा. यहां ज्यादातर पत्रकार सच में आज़ाद नहीं हैं बल्कि मालिक के अंगूठे के नीचे हें वही मालिक, जो राजनीतिक नेताओं के सामने दंडवत रहता है.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं.)

इस न्यूज़ को इंग्लिश में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।  If CNN Can Stand up to Trump, Why Can’t Indian Media Question the Powers That Be? https://thewire.in/media/cnn-trump-acosta-indian-media

1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में यशपाल सिंह को फांसी

1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में यशपाल सिंह को फांसी
BY द वायर स्टाफ ON 20/11/2018
दिल्ली की एक अदालत ने दो लोगों की हत्या के मामले के दूसरे दोषी नरेश सहरावत को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई. इस मामले में पहली बार किसी को मौत की सज़ा सुनाई गई है.

नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने 1984 के सिख विरोधी दंगों में दो लोगों की हत्या के दोषी यशपाल सिंह को मंगलवार को फांसी की सज़ा सुनाई. इस मामले में पहली बार किसी को मौत की सज़ा सुनाई गई है.

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे ने मामले में सह दोषी नरेश सहरावत को भी उम्रक़ैद की सजा सुनाई. दोनों दोषियों पर 35 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है.

दिल्ली अदालत परिसर में दोषियों पर हमले और सुरक्षा चिंताओं के चलते फैसला तिहाड़ जेल में सुनाया गया.

अदालत ने 14 नवंबर को सिंह और सहरावत को 1984 में यहां सिख विरोधी दंगों के दौरान दो लोगों की हत्या करने का दोषी पाया था. एसआईटी द्वारा मामला फिर से खोले जाने के बाद पहली बार किसी को दोषी पाया गया.

यशपाल सिंह और नरेश सेहरावत को सिख विरोधी दंगों के दौरान दक्षिण दिल्ली के महिपालपुर में हरदेव सिंह और अवतार सिंह की हत्या का दोषी ठहराया था. यह मामला हरदेव सिंह के भाई संतोख सिंह की ओर से दर्ज कराया गया था.

दिल्ली पुलिस ने साक्ष्यों के आभाव में 1994 में मामला बंद कर दिया था. हालांकि दंगों को लेकर गठित एक विशेष जांच दल ने मामले को फिर से खोला.

अकाली दल नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि वे सहरावत को सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को चुनौती देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि उसे भी उसके अपराधों के लिए फांसी की सज़ा मिले.

सिरसा ने कहा, ‘हम निर्णय से संतुष्ट हैं किन्तु हम लड़ाई जारी रखेंगे और एक आरोपी को सुनायी गई आजीवन कारावास की सज़ा को चुनौती देंगे. हम यह सुनिश्चित करेंगे उसे भी उसके अपराधों के लिए फांसी मिले.’

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के प्रमुख एवं अकाली दल के नेता मंजीत सिंह जी ने कहा कि निर्णय अन्य पीड़ितों को सामने लाने के लिए प्रोत्साहित होंगे.

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सरदार आरपी सिंह ने निर्णय का स्वागत किया. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि दिल्ली एवं अन्य राज्यों में 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच की निगरानी के लिए गठित विशेष जांच दल के तीसरे सदस्य का नाम तुरंत अधिसूचित किया जाए.

आम आदमी पार्टी के नेता एचएस फुल्का ने कहा कि यह बड़ा फैसला है और सिख नेताओं में यह आस जागी है कि अन्य मामलों में भी पीड़ितों को न्याय मिलेगा.

 

 

 

ये खबर आज the wire से लिया गया है

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

नोटबंदी से किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ा :कृषि मंत्रालय

BY द वायर स्टाफ ON 21/11/2018

कृषि मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि नोटबंदी की वजह से किसानों को खाद और बीज खरीदने में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा था

नई दिल्ली: कृषि मंत्रालय ने संसदीय समिति को भेजे अपने जवाब में ये स्वीकार किया है कि नोटबंदी की वजह से किसानों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक मंत्रालय ने वित्त पर संसदीय स्थायी समिति को सौपे अपने रिपोर्ट में कहा कि नोटबंदी की वजह से भारत के लाखों किसान ठंड की फसलों के लिए खाद और बीज नहीं खरीद पाए थे.

कृषि मंत्रालय का बयान ऐसे समय पर आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के झाबुआ में एक रैली के दौरान कहा था कि काला धन बैंकिग सिस्टम में वापस लाने के लिए नोटबंदी एक ‘कड़वी दवा’ थी.

वित्त पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष कांग्रेस सांसद वीरप्पा मोइली को बीते मंगलवार को कृषि मंत्रालय, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग मंत्रालय द्वारा नोटबंदी के प्रभावों के बारे में बताया गया.

कृषि मंत्रालय द्वारा सौंपे गए रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी ऐसे समय पर की गई जब किसान अपनी खरीफ फसलों की बिक्री और रबी फसलों की बुवाई में लगे हुए थे. इन दोनों कामों के लिए भारी मात्रा में कैश की जरूरत थी लेकिन नोटबंदी की वजह से सारा कैश बाजार से खत्म हो गया था.

मंत्रालय ने आगे कहा, ‘भारत के 26.3 करोड़ किसान ज्यादातर कैश अर्थव्यवस्था पर आधारित हैं. इसकी वजह से रबी फसलों के लिए लाखों किसान बीज और खाद नहीं खरीद पाए थे. यहां तक कि बड़े जमींदारों को भी किसानों को मजदूरी देने और खेती के लिए चीजें खरीदने में समस्याओं का सामना करना पड़ा था.’

कैश की कमी के वजह से राष्ट्रीय बीज निगम भी लगभग 1.38 लाख क्विंटल गेंहू के बीज नहीं बेच पाया था. ये स्थिति तब भी नहीं सुधर पाई जब सरकार ने कहा था कि 500 और 1000 के पुराने नोट गेंहू के बीज बेचने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

संसदीय समिति की बैठक के दौरान विपक्षी दलों के कई सदस्यों ने इसे लेकर काफी तीखे सवाल किए. सूत्रों ने बताया कि ऑल इंडिया त्रिणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी ने पूछा कि क्या सरकार को सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के उस रिपोर्ट की जानकारी थी, जिसमें कहा गया है कि नोटबंदी के बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के बीच 15 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं.

हालांकि श्रम मंत्रालय ने नोटबंदी की प्रशंसा करते हुए रिपोर्ट फाइल किया है.

बता दें कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कृषि संकट एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. सभी पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में किसानों की स्थिति सुधारने का दावा किया है.

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मध्‍य प्रदेश: सट्टेबाजों का कांग्रेस पर बढ़ा भरोसा, लगा रहे बड़े दांव!

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अब बछड़े से मिलेगी मुक्ति, बछिया ही होगी पैदा, विकसित की गई ऐसी तकनीक

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राम मंदिर को लेकर ये क्या बोल गए शिवपाल, अयोध्या में निर्माण को बताया भाजपा का चुनावी स्टंट

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माधुरी बोलीं, आखिरकार इस तरह का मौका पाने पर उत्साहित हूं

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पाकिस्तान से नाराज है अमेरिका, रोकी 1.66 अरब डॉलर की सहायता राशि

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पूर्व समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने बुर्के में मंझौल कोर्ट में सरेंडर किया — Marginalised

बेगूसराय : मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा ने बेगूसराय कोर्ट में सरेंडर कर दिया है. पिछले कुछ दिनों से वे फरार चल रही थीं और उनकी तलाश में पुलिस ने कई जगहों पर छापामारी की थी. ज्ञात हो कि मंजू वर्मा आर्म्स एक्ट मामले में फरार चल रही थीं.…

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राफेल के साथ राहुल गाँधी और उनकी काँग्रेस कहाँ जा रही है? — Mentor Counsel Coach

आख़िर ऐसी क्या वजह है कि जिसके चलते राफेल पर राहुल गाँधी अपने तथाकथित राजनीतिक करियर के साथ सबकुछ दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं? मुझे यकीन है कि राजनेता होने के नाते वे जानते होंगे या उन्हें इस बात की सलाह भी दी गई होगी कि उन्हें सारे तीर एक ही तरक़श […]

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टी-20 में ऑस्ट्रेलिया पर भारी रहा है भारत का पलड़ा — supremenews.in

भारतीय क्रिकेट टीम बुधवार को ऑस्ट्रेलिया से जंग की शुरुआत टी-20 सीरीज से करेगी। पहले मुकाबले में दोनों ही टीमें विजयी आगाज करने के इरादे से मैदान पर उतरेंगी। टीम इंडिया के खिलाड़ी इस समय शानदार लय में नजर आ रहे हैं और हाल ही में घरेलू क्रिकेट सीरीज व कुछ समय पहले इंग्लैंड की […]

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जून, 2019 से गांधी सेतु के दोनों लेन पर गाड़ियां चलने लगेंगी — Marginalised

पटना: गांधी सेतु का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है. हाजीपुर की तरफ से पांचवें और छठे स्पैन पर लोहे के गार्डर की लांचिंग हो गई. उसके ऊपर लगाए जाने वाले सुपरस्ट्रक्चर का स्लैब भी तैयार है. कोलकाता, चेन्नई, गाजियाबाद व अहमदाबाद से दर्जनभर से अधिक स्पैनों के गार्डर और लोहे के प्लेट हाजीपुर स्थित…

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31 दिसंबर से पहले दें संपत्ति का विवरण: मुख्यमंत्री नीतीश का अपने मंत्रियों को आदेश — Marginalised

नीतीश ने 2005 में हर साल मंत्रियों की संपत्ति सार्वजनिक करने का फैसला किया था पटना. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के सभी मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर संपत्ति का विवरण देने का निर्देश दिया है. नीतीश ने उपमुख्यमंत्री समेत 26 मंत्रियों को 31 दिसंबर से पहले चल-अचल संपत्ति का ब्योरा देने को कहा है. वेबसाइट […]

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शराबबंदी लागू करने के चलते मेरे खिलाफ सोशल मीडिया पर चल रही साजिशन कैम्पेन: नीतीश — Marginalised

करगहर . करगहर में सोमवार को दो कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर विरोधियों द्वारा बड़ी साजिश रची जा रही है क्योंकि, मैंने राज्य में शराबबंदी लागू की. सोशल मीडिया पर शराबबंदी को अधिकारों के हनन से जोड़कर भ्रम फैलाई जा रही है. उन्होंने आम लोगों…

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एक ख़ास अंदाज़ में मैडम तुस्साद म्यूजियम में अनुष्का शर्मा की मोम की प्रतिमा लगी — Marginalised

सिंगापुर: अपनी फिल्मों से हिंदी सिनेमा में लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहीं अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने शोहरत की एक और बुलंदी को छूआ है. अनुष्का शर्मा की मोम की बनी प्रतिमा सिंगापुर के मैडम तुसाद म्यूजियम में लगाई गई है. इसी के साथ ही वह इस म्यूजियम में शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन जैसे सितारों…

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हरे कृष्ण महामंत्र — Vaishnava Gitavali

Hare Kṛṣṇa Mahā-mantra (in Hindi) हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ध्वनि श्रील प्रभुपाद

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पटना का हनुमान मंदिर; वैष्णो देवी के बाद उत्तर भारत का दूसरा सबसे धनवान मंदिर — Marginalised

उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल पटना जंक्शन स्थित महावीर मंदिर में रामनवमी के दिन अयोध्या की हनुमानगढ़ी के बाद सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती है. इस मंदिर को हर दिन लगभग एक लाख रुपये की राशि विभिन्न मदों से प्राप्त होती है. उत्तर भारत में यह मंदिर दूसरा समृद्ध मंदिर है, पहले स्थान पर […]

via पटना का हनुमान मंदिर; वैष्णो देवी के बाद उत्तर भारत का दूसरा सबसे धनवान मंदिर — Marginalised

विवादास्पद राम जन्मभूमि पर बनी फिल्म ” राम जन्मभूमि” — Marginalised

2019 का लोक सभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं. ऐसे में कुछ फिल्मकारों ने भी इस मौके का व्यवसायिक फायदा उठाने की कोशिश में जुट गये हैं. ताजा नाम इस सीरीज में वासिम रिजवी का है. वसीम रिजवी राम मंदिर पर अपने विचार को सिनेमा के माध्यम से पूरे देश तक पहुंचाने जा रहे हैं.…

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